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ग़ज़ल नूर की--ये अजब क़िस्सा रहा है ज़िन्दगी में

२१२२/ २१२२/२१२२ 
.
ये अजब क़िस्सा रहा है ज़िन्दगी में
याद आता है मुझे वो बेख़ुदी में.
.
काश उन के लब मेरे होंठों को चूमें
मूँद कर आँखें.. पडा हूँ चाँदनी में.
.
जब रिहाई की कोई सूरत नहीं है
लुत्फ़ लेना सीख ही लूँ बेबसी में.
.
एक जुगनू जो लड़ा था तीरगी से    
याद कर लेना उसे भी रौशनी में.
.
याद कर के अपने माज़ी के पलों को
बहते हैं आँखों से आँसू हर ख़ुशी में.
.
आपका अहसान मुझ पर यह बहुत है
आप ने है दर्द घोला शाइरी में.
.
सोचने के वक़्त तुम को सोचता हूँ
और बाक़ी कट रही है नौकरी में.  
.
लुत्फ़ मिलता है बहुत ग़मगीन रहकर
जैसे कुछ बाक़ी नहीं हो ज़िन्दगी में.
.
निलेश "नूर"
मौलिक अप्रकाशित 

Views: 135

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 17, 2018 at 3:18pm
शुक्रिया आ. मोहम्मद आरिफ साहब
Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 17, 2018 at 12:03pm

सोचने के वक़्त तुम को सोचता हूँ 
और बाक़ी कट रही है नौकरी में.  
.
लुत्फ़ मिलता है बहुत ग़मगीन रहकर
जैसे कुछ बाक़ी नहीं हो ज़िन्दगी में   , ऐसे सभी शेर अच्छे है , ये दोनों अभूत अछे लगे 
 मुबारक बाद कुबूल कीजिये  निलेश भाई 

Comment by Samar kabeer on January 17, 2018 at 10:47am

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by SALIM RAZA REWA on January 16, 2018 at 5:29pm
भाई नीलेश जी ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई,
Comment by Ajay Tiwari on January 16, 2018 at 4:08pm

आदरणीय निलेश जी, उम्दा ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

काश दो लब मेरे होंठों को चूमें'  इस मिसरे में 'वो' छूट गया लगता है. .

यूं तो सारे शेर खूबसूरत हैं लेकिन एक शेर अलग से चमक रहा है :

सोचने के वक़्त तुम को सोचता हूँ 
और बाक़ी कट रही है नौकरी में

सादर .  

Comment by Mohammed Arif on January 16, 2018 at 12:56pm


लुत्फ़ मिलता है बहुत ग़मगीन रहकर
जैसे कुछ बाक़ी नहीं हो ज़िन्दगी में. वाह! वाह!! बहुत ही सच्चा शे'र लगा ।

हर शे'र माक़ूल । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आदरणीय नीलेश जी । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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