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डर लगता है दुनिया से

और घर वालों के तानों से,

और कभी डर जाती हूँ मैं

प्यार के इन अफसानों से।।

कितनी मुश्किल आती है

और कितने ही गम सहते हैं,

लाखों कोशिश कर लें-

फिर भी तन्हा ही हम रहते हैं।।

रहता कुछ भी याद नहीं 

जब याद किसी की आती है,

प्रेस से कपड़े जलते हैं-

काॅफी फीकी रह जाती है।।

माँ भी गुस्सा करती है

और बापू भी चिल्लाते हैं,

मगर किसी को इस दिल के

हालात समझ ना आते हैं।।

होती है जब रात सुकूँ से 

ये सारा जग सोता है,

सारी सारी रात जाग

मेरा दिल ख़्वाब संजोता है।।

कुछ पल बीते आँख लगी

माँ मुझे जगाने लगती है,

कितना सोयेगी...कह कह कर

शोर मचाने लगती है।।

दिन भर मुरझाया सा मन

फिर इक पल में खिल जाता है,

रौशन हो उठतीं आँखें-

जब कहीं नजर तू आता है।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 7, 2018 at 7:16pm

आद0 रक्षिता सिंह जी सादर अभिवादन। बहुत ही बेहतरीन सृजन। भाव सम्प्रेषण उत्तम। बधाई आपको इस सृजन पर

Comment by Sushil Sarna on February 5, 2018 at 8:13pm

इस भावपूर्ण सुंदर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया।

Comment by SALIM RAZA REWA on February 5, 2018 at 7:43pm
आ. Rakshita जी.
बहुत खूबसूरत रचना हुई है मुबारक़बाद कुबूल फरमाएं.
Comment by narendrasinh chauhan on February 5, 2018 at 1:38pm
खुब सुन्दर रचना
Comment by Rakshita Singh on February 5, 2018 at 1:34pm

आदाब आदरणीय आरिफ जी  एवं तस्दीक जी,

सराहना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। श्रीमान समर कबीर जी  के इस्लाह  को मद्दे नजर रखते हुए मैंने अपनी त्रुटियाँ सुधारली हैं।

Comment by Mohammed Arif on February 5, 2018 at 10:10am

आदरणीया रक्षिता जी आदाब,

                    छू लेने वाली रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह पर गौर करें ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 5, 2018 at 9:32am

मुहतर्मा रक्षिता साहिबा , दिल की गहराइयों को छूती सुन्दर रचना हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं।

Comment by Rakshita Singh on February 5, 2018 at 8:52am

आदरणीय कबीर जी एवं मेरे समस्त  गुणीजन, 

 मार्गदर्शन व हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया... लेखन सार्थक हुआ।।

Comment by Mohit mishra (mukt) on February 5, 2018 at 7:14am

आदरणीय रक्षिता सिंह जी नमस्कार,
दिल के भावों को सरल शब्दों में बेहतरीन ढंग से व्यक्त करने के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on February 4, 2018 at 10:02pm

मोहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,बहुत उम्दा रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'कितनी मुश्किल आती हैं'

इस पंक्ति में 'मुश्किल'शब्द एक वचन है, इसलिये 'हैं' को "है" करना उचित होगा ।

20वीं पंक्ति में 'खआव' क्या है?,शायद आप "ख़्वाब"लिखना चाहती थीं?

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