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नजर से वार करूँ या जुबाँ से बात करूँ

मापनी :-
1212-1122-1212-112

शुरू कहाँ से करूँ ओऱ कहाँ से बात करूँ।।
नजर से वार करूँ या जुबाँ से बात करूँ।।

मुझे तो इतना तज्ज्रिबा नहीं मुहब्बत की।
फ़िसल वो जाएं शुरू मैं जहां से बात करूँ।।

कोई हसीन सा किरदार जिंदगी से जुड़े।
यही है चाह की उल्फत की हाँ से बात करूँ ।।

समझ समझ के समझ को समझ न पाए हमीं।
की किससे कौन अदा से जुबाँ से बात करुं।।

मेरे हबीब मेरे रब मेरी अना में अभी।
है इतनी चाह जमीं आसमाँ से बात करूँ।।


आमोद बिंदौरी
मौलिक/ अप्रकाशित

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Comment by amod srivastav (bindouri) on February 14, 2018 at 8:55am

आ तस्दीक साहब आप को नमन , सर मेरी जानकारी जहाँ तक है । गजल लहजे का दूसरा नाम है । शेर रफ्त की जो बात आप ने कही  , मैं न नही कह रहा ।पर मै अपने लहजे में लिखता हूँ । अपने भाव अंदाज में, हाँ अगर कोई दोश हो तो आप जरूर अवगत कराये , मैं आप के मार्गदर्शन की प्यास रखता हूँ । और उसके लिए आप का आभार भी व्यक्त करता हूँ ।

तज्रिबा टंकण त्रुटि थी क्षमा चाहते हैं ....नमन

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2018 at 9:56am

आ. भाई आमोद जी प्रयास के लिए बधाई । भाई तस्दीक अहमद जी की सलाह पर भी गौर कीजिए ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 11, 2018 at 4:49pm

जनाब आमोद साहिब , ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है ,ग़ज़ल महनत चाहती है ,कोशिश बार बार कीजिये ,फिर रब्त क़ायम होने पर मिसरे को चुनिए ।

सही शब्द तज रि बा -है और  नज़र से वार दुश्मन करता है । ज़्यादा तर मिसरों में रब्त की कमी है  ।शेर में बदलाव करके लिख रहा हूँ ,उनपर गौर करें। शेर1--नज़र से बात करूं या ज़ुबाँ से बात करूं--शुरुए इश्क़ है मैं अब कहाँ से बात करूं।  

शेर2--मुझे तो तज रि बा इतना नहीं महब्बत का -वो जाएं जाएं फिसल मैं जहां से बात करूं ।

शेर3--इसे मक़्ता करलें । कोई तो हो मेरा आमोद इस ज़माने में--मैं जिस अज़ीज़ से जाने जहां की बात करें।

शेर4--मेरी समझ मे ही आती नहीं है बात मेरी --यहां से बात करूं या वहां से बात करूं।

शेर5--हवा में उड़ना भी आया नहीं मुझे अबतक--मैं किस तरह से भला आसमां की बात करूं।

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