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लघुकथा--कठपुतली

एक राजनेता से पूछा -" आप तीखी बयानबाज़ी या शोला बयानी क्यों करते हैं ? इससे दूसरे वर्गों की भावनाएँ आहत है । देश का माहौल ख़राब होता है । अपनी ज़बान पर थोड़ा ताला क्यों नहीं लगाते ?"
राजनेता -" ज़बान पर ताला या नियंत्रण नहीं लगा सकता । मेरे हाथों में नहीं है ।"
मैंने पलटवार करते हुए पूछा -" फिर किसके हाथों में है ?"
" पार्टी आला कमान के ।" कुतिलता से मुस्कुराते हुए चल दिए ।

मौलिक एवं अप्रकाशित। ।

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Comment by Mohammed Arif on March 21, 2018 at 10:36pm

रचना के अनुमोदन और उत्साहवर्धन का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीया कल्पना भट्ट जी ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 21, 2018 at 10:32pm

अच्छी लघुकथा हुई है, तीखा बाण चलाया है आपने आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी | हार्दिक बधाई|

Comment by Mohammed Arif on March 21, 2018 at 9:35pm

आपकी पहली टिप्पणी पाकर बहुत उत्साहित हूँ आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी । दिल की अथाह गहराईयों से आभार ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 21, 2018 at 9:19pm

मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब आदाब, आपने तो जैसे गागर में सागर भर दिया । कम शब्दों में दमदार लघुकथा हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं।

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