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मुंतज़िर मुंतज़िर रहा

मुंतज़िर मुंतज़िर रहा 

मूरत बनाई थी जो

मुस्सवर ख़्यालों में

अब तक वह पाक

हसीन खवाब ही रही

रातों अँधेरे में कभी

दिन के उजाले में भी

रोज़ आई मुस्तकिल:

हलकी-सी मुस्कराई

बिना सलाम चली गई

मैं डरता रहा थर-थर

तस्वीर की तकदीर से...

 

मैं खुश था बहुत  

बाहरआई तो सही

वह उस तस्वीर से

पर मिलते ही लगा

वह खफ़ा थी ज़रा

मुझसे ही हुई होगी

ज़रूर कोई खता ...

आँखें खुलते ही क्यूँ

वह मुंतज़र बाहें

इन मुंतज़िर बाहों से 

हो गईं इतनी पराई ...

        ------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

मुस्सवर          = सचित्र, चित्रित

मुस्तकिल:       = निरंतर

मुंतज़र            = जिसकी प्रतीक्षा करी जा रही हो

मुंतज़िर           = प्रतीक्षक

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Comment by vijay nikore on Friday

सराहना के लिए आपका हृदयतल से आभार, आदरणीय  तस्दीक एहमद जी

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on Thursday

आ.विजय निकोरे साहिब ,दिल के एहसास बयान करती सुन्दर रचना हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by vijay nikore on April 17, 2018 at 10:58pm

सराहना के लिए आपका हृदयतल से आभार, आदरणीय नवीन जी

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 17, 2018 at 9:43pm

लाजवाब प्रस्तुति के लिए बधाई ।

Comment by vijay nikore on April 17, 2018 at 9:00pm

सराहना के लिए आपका हृदयतल से आभार, आदरणीय हर्ष जी

Comment by vijay nikore on April 17, 2018 at 9:00pm

सराहना के लिए आपका हृदयतल से आभार, आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by Harash Mahajan on April 15, 2018 at 2:24pm

आदरणीय - विजय निकोर जी बहुत ही सुंदर कृतियाँ ।

बधाई स्वीकार करें ।

सादर ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 15, 2018 at 1:06pm

आ. भाई विजय जी, बेहतरीन रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on April 14, 2018 at 12:03pm

सराहना के लिए आपका हृदयतल से आभार, आदरणीय बृजेश जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 13, 2018 at 6:36pm

वाकई कमाल हैं आपकी कवितायेँ..

कृपया ध्यान दे...

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