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गुज़रे वक़्तों की वो तहरीर.....संतोष

अरकान:-
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

गुज़रे वक़्तों की वो तहरीर सँभाले हुए हैं,
दिल को बहलाने की तदबीर सँभाले हुए हैं।।

बाँध रक्खा है हमें जिसने अभी तक जानाँ,
हम महब्बत की वो ज़ंजीर सँभाले हुए हैं।।

देखते रहते हैं अजदाद के चहरे जिसमें,
हम वफ़ाओं की वो तस्वीर सँभाले हुए हैं।।

जिन लकीरों में नजूमी ने कहा था,तू है,
दोनों हाथों में वो तक़दीर सँभाले हुए हैं।।

वस्ल की शब में जो देखे थे सुनहरी सपने,
उनकी हम आज भी ताबीर सँभाले हुए हैं।।

#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 18, 2018 at 5:19pm

आदरणीय भाई संतोष जी दिल के जज्वातों को बखूभी पिरोया है आपने इस ग़ज़ल में इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 10:42am

आदरणीय संतोष जी बहुत सुंदर ग़ज़ल की प्रस्तुति । बहुत बहुत मुबारकबाद ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 17, 2018 at 9:30pm

आ0 संतोष जी बहुत सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई  मुझे हर शेर अच्छा लगा ।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on April 17, 2018 at 8:40pm

आदरणीय सन्तोष जी आपकी गजल भावनाओं से ओत प्रोत है बेहतरीन गजल लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by santosh khirwadkar on April 17, 2018 at 6:48pm

प्रणाम आदरणीय समर साहब....तहेदिल से शुक्रिया!!!

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 3:23pm

जनाब संतोष जी आदाब,बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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