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ग़ज़ल नूर की-जिस्म है मिट्टी इसे पतवार कैसे मैं करूँ

२१२२ / २१२२ / २१२२ / २१२

.
जिस्म है मिट्टी इसे पतवार कैसे मैं करूँ
कागज़ी कश्ती से दरिया पार कैसे मैं करूँ.
.
ऐ अदू तेरी तरह गुफ़्तार कैसे मैं करूँ,
फूल बरसाती ज़बां को ख़ार कैसे मैं करूँ.

चाबियाँ मैंने ही दिल की सौंप दी थीं यादों को
आ धमकती हैं जो अब, इन्कार कैसे मैं करूँ.
.
रेत का घर है ये दुनिया तिफ़्ल सी उलझन मेरी  
ख़ुद बना कर ख़ुद इसे मिस्मार कैसे मैं करूँ.
.
रूह बुलबुल है जिसे ये क़ैद रास आती नहीं  
है क़फ़स सोने का पर सिंगार कैसे मैं करूँ.
.
हिज्र के असरात से पथरा गया है दिल मेरा
इस अहिल्या का मगर उद्धार कैसे मैं करूँ.
.   
एक दिन उस “नूर” से जो सामना होगा मेरा  
फ़िक्र ये है रूह को तैयार कैसे मैं करूँ.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2018 at 6:54am

धन्यवाद आ हर्ष महाजन साहब

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2018 at 6:54am

धन्यवाद आ सुशील सरना साहेब

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2018 at 6:54am

धन्यवाद आ दिनेश भाई जी

Comment by Harash Mahajan on April 17, 2018 at 6:17am

"चाबियाँ मैंने ही दिल की सौंप दी थीं यादों को 
आ धमकती हैं जो अब, इन्कार कैसे मैं करूँ"....वाह बहुत ही खूब ।

दिली दाद आदरणीय नीलेश जी ।

सादर

Comment by Sushil Sarna on April 16, 2018 at 8:30pm

रूह बुलबुल है जिसे ये क़ैद रास आती नहीं
है क़फ़स सोने का पर सिंगार कैसे मैं करूँ.

वाह आदरणीय नीलेश जी बड़े ही खूबसूरत अहसास पिरोये हैं आपने अपनी इस बेहतरीन ग़ज़ल में। दिल बधाई स्वीकार करें।

Comment by दिनेश कुमार on April 16, 2018 at 7:43pm

मतला और मक़्ते पर विशेष दिली दाद आदरणीय निलेश सर। उम्दा ग़ज़ल हुई है। वाह वाह वाह

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