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जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते:-मोहित मुक्त

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

आंखे गातीं अनुराग राग ,

जी से मिट जाता विराग ,

उन्माद भरे किसलय दोनों ,

अधरों पर ढुल-ढुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

अनुकंपित होता प्राण सखी ,

स्पंदन युत निर्वाण सखी ,

विप्लव, विषाद सूनी रातें ,

सब लम्हों में धुल-धुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

मदमाते पुष्प नवीन विशद ,

उमड़ा आता मधुभावित नद ,

पलकों के अज्ञात-ज्ञात ,

अवगुंठन सब खुल-खुल जाते,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohit mishra (mukt) on May 16, 2018 at 9:21pm
आदरणीय विजय सर , तारीफ का शुक्रिया
Comment by vijay nikore on May 15, 2018 at 12:36pm

रचना अच्छी लिखी है। बधाई।

Comment by Mohit mishra (mukt) on May 13, 2018 at 11:14pm

आदरणीय समर सर , नमस्कार 

आपकी रचना पर उपस्थिति और उत्साह बढ़ाने का बहुत बहुत आभार 

Comment by Samar kabeer on May 13, 2018 at 9:48pm

जनाब मोहित मिश्रा मुक्त जी आदाब, उम्दा रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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