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नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती
तुम किस धागे से
रिस्ते हुए ज़ख्मों पर
ख़्वाबों का
पैबंद लगाओगे

नहीं जानती
तुम किस चाशनी में डुबोकर
ज़ख़्मी लम्हों को
मेरी आँखों की हथेली पर
सजाओगे

नहीं जानती
तार तार हुए
ख़्वाबों के लिबास
कैसे बेशर्मी को
नज़रअंदाज़ कर पाएंगे

मगर
जानती हूँ
तुम फिर से
मेरे
संग-रेज़ों में तकसीम ख़्वाबों को
अपने शीरीं अल्फ़ाज़ों की नक्काशी से
रौनक अता कर जाओगे


तुम
फिर से
मेरी हर शब का
वुजूह बन जाओगे

वुजूह=कारण

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 17, 2018 at 8:20pm

आदणीय लक्ष्मण धामी जी प्रस्तुति पर आपकी मुक्तकंठ प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on May 17, 2018 at 8:20pm
आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन पर आपकी मधुर प्रतिक्रिया का दिल से शुक्रिया। संशोधन एवं सुझाव के लिए शुक्रिया। संशोधित किया।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 16, 2018 at 7:08pm

आ. भाई सुशील जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on May 16, 2018 at 6:52am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'रौनक अता जाओगे'

इस पंक्ति को यूँ कर लें "रौनक़ अता करोगे"

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