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"मानसून की पहली बारिश का मज़ा" (लघुकथा - हास्य व्यंग्य)

मौसम विभाग ने तो मई के अंतिम सप्ताह में ही सम्भावना व्यक्त कर दी थी कि इस साल औसत से कहीं अधिक बारिश होगी । सभी लोग इस खबर को पढ़ कर खुश भी थे ।   कल रात से ही मानसून का सिस्टम सक्रिय हो गया । बहुत तेज़ गरज के साथ बादलों की आवाजाही होने लगी। 

 एक दम काली घटा ने सारे आसमान पर जैसे क़ब्ज़ा जमा लिया हो। रात से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी।   सौरभ जैसे ही सुबह दस बजे घर से आफिस के लिए कार में जैसे ही बैठा , श्रुति बारिश में भीगती आईं , कार के पास । विंडो का शीशा उतरवा कर सख्ती से हिदायत की । 
"बारिश बहुत तेज़ है । गाड़ी बहुत आराम से धीरे -  धीरे चलाना । अगर और तेज़ हो जाए तो कहीं एक जगह खड़ी कर लेना और जब कम हो जाए , तभी आगे जाना ।"
सौरभ ने भी एक आज्ञाकारी शिष्य की भांति, " हाँ " में सर हिलाते हुए कहा , ठीक है । और फिर हाथ हिलाते हुए बाय बाय किया ।
सौरभ जैसे ही आगे बढ़ा बारिश और तेज़ हो गई ।
 "श्रुति भी न, ... ... ... जिस दिन किसी बात की ताकीद भर दे । समझो फिर तो वही होना है । ये बीवियाँ भी बुढ़ापे में इतनी केयरिंग ही जातीं हैं कि ज़िन्दगी के इतने सारे तजुर्बे से पैदा हुआ आत्मविश्वास भी हिल जाता है । अब गाड़ी कहाँ खड़ी करूँ।" सोचने लगा ।
फिर गाड़ी कहीं एक जगह खड़ी करने के बजाय अपने आप से बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ता हुआ किसी तरह आफिस पहुँच ही गया। आफिस में चेयर पर बैठते ही मोबाइल पर अप्डेट्स चेक करने लगा। 
श्रुति ने व्हाट्सएप पर पूँछा था , - " पहुंच गए ???" 
 " हाँ , श्रुति !!! " सौरभ ने भी जवाब दिया ।
फिर बड़े चाव से वही गुड मॉर्निंग के गुलदस्तों वाले फ्रेंड्स के अप्डेट्स चेक करने लगा । आज तो गुड मॉर्निंग के साथ हैप्पी मानसून और हैप्पी रैनी डे से भरे पड़े थे । सब बहुत खुश भी थे । आज आफिस में भी दिन भर अच्छा रहा । सब लोग भीगते - भागते आते - जाते रहे ।
पता ही नहीं चला कब पाँच बज गए । आफिस से निकला ही था कि श्रुति का फ़ोन आ गया ।
" सौरभ तुमने व्हाट्सएप पर मेरा मैसेज देखा ही नहीं ।मजबूरी में तुम्हें फ़ोन करना पड़ा ।"
सौरभ तो घबरा ही गया अब क्या हुआ ।
"अरे सॉरी श्रुति ,  नेट तो बहुत देर से ऑन था पर मोबाइल टेबल पर पड़ा हुआ था ।"
"बोलो कैसे फ़ोन किया ? "
अरे बारिश तो बंद होने का नाम ही नहीं ले रही । अपने यहाँ आज रात मेहमान भी आने वाले हैं । कहीं ऐसा न हो कि झड़ी लग जाए । तुम ऐसा करना दो किलो प्याज़ और एक किलो आलू ले लेना । बाकी सामान की लिस्ट व्हाट्सएप पर सेंड कर दी है ।
सौरभ ने फिर आज्ञाकारी शिष्य की भांति मन ही मन में फिर " यश मेडम " कहा और फ़ोन पर ही सर भी हिला दिया । जैसे श्रुति सामने खड़ी हो ।
"हाँ श्रुति !" ठीक है। लेकिन , तुम ऐसा करना , पकोड़े तैयार करके रखना । मैं ने तो गाड़ी स्टार्ट कर ही ली समझो ।"
" अरे ...  प्याज़ लाओगे तब न बनेंगे पकोड़े । तुम्हें भी कब अक्ल आएगी, सौरभ "
"अरे हाँ श्रुति,  मैं तो भूल ही गया था बस अभी आया ।"
( मौलिक व् अप्रकाशित )
- मुज़फ़्फ़र
- भोपाल

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Comment by vijay nikore on Thursday

लघु कथा अच्छी लगी... हार्दिक बधाई

Comment by Mohammed Arif on July 9, 2018 at 8:46pm

आदरणीय मुज़फ़्फ़र साहब आदाब,

                             घर से ऑफिस और फिर पत्नी जी हिदायत और केयरिंग के बीच बारिश । बहुत ही बेहतरीन कथानक । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

नोट:- शाम 8:44 पर तेज़ बारिश हो रही थी और मैं आपकी लघुकथा पर टिप्पणी गलियारे में कुर्सी पर बैठा कर रहा था ।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 9, 2018 at 1:46pm

आदरणीय  मुज़फ्फर इक़बाल साहब, नमस्कार ।  काश हम भी ऐसी बारिश का मुकाबला करते और दफ्तर से घर के लिए भीगते हुए मेट्रो तक पहुँचते।  पर  मॉनसून का आना मात्र एक रस्म निभायगी  बन  कर रह गयी । बहुत बढ़िया प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई । 

Comment by babitagupta on July 8, 2018 at 5:39pm

 बारिश पर  कघुकथा पढ़कर शुष्क वर्षा ऋतू में बारिश  का अनुभव करवा दिया.हार्दिक   बधाई स्वीकार  कीजियेगा आदरणीय सरजी 

Comment by Samar kabeer on July 8, 2018 at 2:52pm

जनाब मुज़फ़्फ़र इक़बाल साहिब आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 8, 2018 at 9:18am

आद0 मुज़फ्फर इकबाल जी सादर अभिवादन। बढ़िया लघुकथा कही आपने। वैसे अभी तक हमारे यहाँ कोई खास बारिश हुई नही है,, अतएव आपकी लघुकथा के माध्यम से ही बारिश का आनन्द ले रहा हूँ। बहुत बहुत बधाई आपको।

Comment by MUZAFFAR IQBAL SIDDIQUI on July 8, 2018 at 6:40am

बहुत बहुत शुक्रिया, शेख साहब। 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 7, 2018 at 11:39pm

वाह। भिगो दिया बरसात की शाब्दिक बौछार ने। हार्दिक बधाइयां आदरणीय मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीक़ी साहिब।

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