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मुहब्बत में हमीं मुजरिम हैं हम ये मान लेते हैं
चलो अब तुम कहो तुमसे तुम्हारी जान लेते हैं

ज़रा हम भी तो देखें धार उन क़ातिल निगाहों की
सुना है वो इसी ख़ंजर से सबकी जान लेते हैं

जो फिर देखो उन्हें तो वो जुदा लगते हैं पहले से
कहें कैसे कि हम उनको सही पहचान लेते हैं

कभी गुस्सा कभी आँसू कभी फिर रूठना उनका
वो कितने इम्तिहाँ मुझसे मेरे भगवान लेते हैं

तो फिर दुनिया क्या इस दुनिया का रखवाला भी झुकता है
मुहब्बत करने वाले भी अगर ज़िद ठान लेते हैं

जो दिल देते हो तुम हमको तो फिर ये जान हाज़िर है
भला यूँ ही किसी का हम कहाँ अहसान लेते हैं

फ़क़त इक पल की ख़ातिर उनकी आँखों से लड़ीं आँखें
बस इतनी बात पर अब वो मेरा ईमान लेते हैं


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by sharadindu mukerji on Sunday

प्रिय आलोक जी, आपको इस मंच पर देखकर बेहद अच्छा लग रहा है. आपकी रचना के बारे में कुछ भी कहने में मैं असमर्थ हूँ......विद्वानों की प्रतिक्रिया आपको और ऊँचाईयों तक ले जाएगी क्योंकि व्यक्तिगत रूप से आपको जानता हूँ....आप सलाह को हमेशा सकारात्मक ढंग से लेते हैं. ओबीओ ऐसे ही उत्तरोत्तर प्रगति करता रहे यही मेरी कामना है. मंच पर आपकी उपस्थिति नि:संदेह इसे और प्रकाशमय करेगी. बहुत-बहुत शुभकामनाएँ.

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday

बहुत ही खूबसूरत और सरस  ग़ज़ल कही है आदरणीय..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 11, 2018 at 7:01pm

आ. आलोक जी, अच्छी गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।

Comment by Shyam Narain Verma on July 11, 2018 at 2:43pm
"क्या बात है ..... बहुत खूब ... बधाई आप को " ..सादर 
Comment by Samar kabeer on July 11, 2018 at 2:36pm

कभी गुस्सा कभी आँसू कभी फिर रूठना उनका

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,'फिर रूठना',गुरप्रीत जी का सुझाया मिसरा उचित है,देखियेगा ।

Comment by Samar kabeer on July 11, 2018 at 2:30pm

आख़री शैर इस तरह और बहतर हो सकता है:-

'बस इक पल के लिये ही उनकी आँखों से लड़ीं आँखें

और इतनी सी ख़ता पर वो मेरा ईमान लेते हैं'

Comment by Samar kabeer on July 11, 2018 at 12:23pm

जनाब आलोक रावत जी आदाब, 'फ़िराक़' की ज़मीन में अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

कुछ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा ।

मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,ग़ौर कीजियेगा ।

'ज़रा हम भी तो देखें धार उन क़ातिल निगाहों की

सुना है वो इसी ख़ंजर से सबकी जान लेते हैं'

इस शैर में शुतरगुर्बा है, ऊला मिसरे में 'निगाहों' बहुवचन है, और सानी मिसरे में "ख़ंजर" एक वचन देखियेगा ।

मुहब्बत करने वाले भी अगर ज़िद ठान लेते हैं

इस मिसरे में 'ज़िद ठान' की तरकीब सहीह नहीं है,इस मिसरे को यूँ होना था:-

'महब्बत करने वाले जब भी दिल में ठान लेते हैं'

फ़क़त इक पल की ख़ातिर उनकी आँखों से लड़ीं आँखें

इस मिसरे में। 'ख़ातिर' शब्द भर्ती का है, ये मिसरा यूँ होना था:-

'जो इक पल के लिये ही उनकी आँखों से लड़ीं आँखें'

आपके लेखन में रवानी है, जो आपको बहुत आगे तक ले जाएगी,शुभकामनाएँ ।

Comment by Gurpreet Singh on July 11, 2018 at 12:05pm

आदरणीय आलोक रावत जी , पहली बार इस मंच पर आपकी ये ग़ज़ल पढ़ी , और निश्चित ही बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है। और हाँ  इस्लाह तो उस्ताद ही करेंगे , मैं तो खुद एक अदना सा विद्यार्थी हूँ ग़ज़ल का। जो प्रश्न मन उठते है उन पर आपस में बातचीत से सीखने की कोशिश रहती है। रूठना वाले शेर में 'फिर' के अंत का र और उसके बाद 'रूठना' के शुरू का रु , आपस में टकरा रहे हैं , और इस मिसरे में मुझे लगा कि 'फिर' शब्द के बिना भी बात पूरी हो रही है , इसलिए नाराज़गी रखने के लिए कहा। ये सिर्फ मेरे विचार हैं , बाकी गुणीजन आपको इसके बारे बारे में बेहतर बता पाएंगे। ... धन्यवाद

Comment by Alok Rawat on July 11, 2018 at 11:42am

आदरणीय दादा गोपालजी, सादर प्रणाम , आप ठीक कहते हैं | आप सदैव मेरे शुभचिंतक रहे हैं | ओ बी ओ में ये मेरी दूसरी ग़ज़ल है | पहली ग़ज़ल में मुझे आदरणीय समर कबीर साहब का और अन्य लोगों का उचित मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था | मेरी दृष्टि में सीखने के लिए इस मंच से बेहतर दूसरा और कोई मंच नहीं है | बड़े प्यार,स्नेह और विनम्रता के साथ इस्लाह दी जाती है | मैं अपनी सक्रियता बनाये रखूंगा | कोशिश करूँगा की और बेहतर कह सकूं |

Comment by Alok Rawat on July 11, 2018 at 11:35am

आदरणीया नीलम जी आपका बहुत बहुत आभार

कृपया ध्यान दे...

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