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न कर जिक्र

जब तक है जान

काहे की फिक्र

 

मन अंतस

जजवातों से भरा

पर अकेला

 

धरते धीर

शिखर पहुँचते

बैसाखी पर

  

क्या पा लिया था

ये तब जाना, जब

उसे खो दिया

खुशी ही नहीं

तल्खियाँ भी देती हैं

तनहाईयाँ

 

… मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by narendrasinh chauhan 4 minutes ago

सुन्दर रचना 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday

वाह भाव भरे हाइकू आदरणीया..बधाई

Comment by Neelam Upadhyaya on Friday

आदरणीया राजेश कुमारी जी, रचना को समय  देने के लिए बहुत बहुत आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on Thursday

बहुत अच्छे  हाइकु आद० नीलम जी वर्तनी की तरफ इशारा हो ही चुका है थोड़े से फेर बदल से बहरीन हो जाएंगे .हार्दिक बधाई आपको 

Comment by Neelam Upadhyaya on Thursday

आदरणीय तेजवीर सिंह जी, विजय निकोरे जी, गलतियों को नज़र अंदाज करके भी रचना की तारीफ कर मनोबल बढ़ाने  के लिए बहुत बहुत आभार।

सभी गुणी  जनो  से आग्रह है कि  आप अवश्य ही गलतियों को इंगित किया करें।   

Comment by Neelam Upadhyaya on Thursday

मन अंतस

जज़्बातों   से भरा

पर अकेला


खुशी ही नहीं

तल्ख़ियाँ  भी देती हैं

तन्हाईयाँ

आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी, वर्तनी सम्बन्धी गलतियों को इंगित करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद तथा उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत आभार ।  मैंने कोशिश किया मुख्य रचना में सुधार के लिए लेकिन नहीं हो पाया ।  अब यहीं पोस्ट किया है।  दर असल तीन दिनों से पावर सप्लाई ने बहुत तंग किया है।  पोस्ट करते समय भी नेट ने बड़ा तंग किया।  कॉपी पेस्ट में जो लिखा वो कंप्यूटर महाराज ने अपने हिसाब से वर्तनी कर लिख दिया।  यहाँ तक तो ठीक है अपनी प्रकाशित रचना भी आज ही  देख पायी हूँ।  कल प्रयास कर के भी  लॉग इन नहीं कर पायी। 

Comment by Neelam Upadhyaya on Thursday

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी साहब, उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत आभार। 

Comment by Neelam Upadhyaya on Thursday

आदरणीय समर कबीर जी, उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत आभार। 

Comment by Neelam Upadhyaya on Thursday
आदरणीय श्याम नारायण जी, बहुत बहुत आभार।
Comment by vijay nikore on Thursday

हाइकू लिखने कभी आसान नहीं थे, परन्तु आपकी कलम ने तो कमाल ही कर दिया। आनन्द आ गया।

कृपया ध्यान दे...

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