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जनाब निलेश 'नूर' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2 (कुछ नये क़वाफ़ी के साथ)

मैं तो उसकी पे ब पे अंगड़ाइयाँ गिनता रहा

और वो दामन की मेरे धज्जियाँ गिनता रहा

सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये

मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा

मेरे सीने पर सितम की मश्क़ वो करते रहे

और मैं मासूम दिल की किर्चियाँ गिनता रहा

काम जब कुछ भी नहीं था ओबीओ पर दोस्तो

'नूर' साहिब की मैं कूड़ेदानियाँ गिनता रहा

मेरी बर्बादी पे ख़ुश होकर अज़ीज़ों ने "समर"

कितनी छोड़ीं रात भर महताबियाँ गिनता रहा

-----

पे ब पे---लगातार

मश्क़---अभ्यास

'नूर'---निलेश नूर

म्हताबियाँ---आतिश बाज़ी

'समर कबीर'

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Ashish shrivastava on Thursday

बहुत ख़ूब , मुहतरम समर कबीर साहब !

क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है । हर क़ाफ़िया ख़ुद में न सिर्फ़ अलग है लेकिन साथ ही कहीं और देखने में आना भी दुश्वार भी है । मुबारकबाद ! महताबियाँ तो ममेरे लिये नया लफ़्ज़ ही है ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on Wednesday

सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये

मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा---वाह्ह्ह्हह वाह्ह्ह्ह 

नीलेश की कूड़ेदानी जिंदाबाद.... हाहाहा 

बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है समर भाई जी 

Comment by Mohammed Arif on Wednesday

सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये

मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा वाह! वाह! बहुत ही मारक क्षमता वाला शे'र ।

शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on Wednesday

वाह वाह वाह आ. समर सर.. क्या कहने 
बहुत खूब ग़ज़ल हुई है... इस ज़मीन पर आपकी दूसरी ग़ज़ल के बाद मुझे भी कुछ करना पड़ेगा अब.. और कूड़ेदानी तो लगता है #कालजयी हो जायेगी :))))))
बहुत बहुत बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on Wednesday
बहुत सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई  ..सादर 

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