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हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये (ग़ज़ल राज)

बेसबब बेसाख़्ता रफ़्तार है कुछ कीजिये 
लड़खड़ाती जिंदगी हर बार है कुछ कीजिये 

उठ रही हैं उँगलियाँ सब आपके घर की तरफ़ 
हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये 

वक्त आते ही डसेगा एक दिन वो आपको 
आस्तीं में पल रहा मक्कार है कुछ कीजिये 

आपके घर की तरफ़ से आ रहे पत्थर सभी 
आपके घर में छुपा गद्दार है कुछ कीजिये 

इस तरह तो मुफ़्लिसी दम तोड़ देगी भूख से 
आसमां को छू रहा बाज़ार है कुछ कीजिये

हैं मुखालिफ़ कुछ हवायें हो रही कमजोर छत 
डगमगाती आपकी सरकार है कुछ कीजिये 

काम की मसरूफ़यत से घूमने जाते नहीं 
आज बच्चे कह रहे इतवार है कुछ कीजिये

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on July 12, 2018 at 7:29am

हासिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये।

ग़ज़ल का हर शेर बोलता हुआ है। खूबसूरत ग़ज़ल कहने के लिये हार्दिक बधाई।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 12, 2018 at 6:42am

हर शे'अर दमदार और विचारोत्तेजक।  लघुकथा के लिये बेहतरीन कथानक। हार्दिक बधाइयां आदरणीया राजेश कुमारी साहिबा।

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