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हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये (ग़ज़ल राज)

बेसबब बेसाख़्ता रफ़्तार है कुछ कीजिये 
लड़खड़ाती जिंदगी हर बार है कुछ कीजिये 

उठ रही हैं उँगलियाँ सब आपके घर की तरफ़ 
हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये 

वक्त आते ही डसेगा एक दिन वो आपको 
आस्तीं में पल रहा मक्कार है कुछ कीजिये 

आपके घर की तरफ़ से आ रहे पत्थर सभी 
आपके घर में छुपा गद्दार है कुछ कीजिये 

इस तरह तो मुफ़्लिसी दम तोड़ देगी भूख से 
आसमां को छू रहा बाज़ार है कुछ कीजिये

हैं मुखालिफ़ कुछ हवायें हो रही कमजोर छत 
डगमगाती आपकी सरकार है कुछ कीजिये 

काम की मसरूफ़यत से घूमने जाते नहीं 
आज बच्चे कह रहे इतवार है कुछ कीजिये

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on Thursday

आद० समर कबीर भाई जी आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरी मेहनत सफल हुई आपका तहे दिल से बेहद शुक्रिया आपकी इस्साह बिलकुल सही है वो की जगह ये ठीक रहेगा 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on Thursday

आद०  तेजवीर सिंह जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on Thursday

आद० रामअवध जी आपका तहे दिल से बेहद शुक्रिया .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on Thursday

आद. उस्मानी जी, आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Thursday

आ. राजेश दी, सादर आभिवादन ।अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Shyam Narain Verma on Thursday
इस उम्दा ग़ज़ल के लिए ह्रदय से बधाई स्वीकार करें सादर 
Comment by Mohammed Arif on Thursday

आदरणीया राजेश कुमारी जी आदाब,

                               बहुत ही उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र माकूल और कसावट लिए मारक क्षमता लिए । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Ajay Kumar Sharma on Thursday

शानदार गजल.

बहुत ही शानदार....

Comment by Samar kabeer on Thursday

बहना राजेश कुमारी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

तीसरे शैर के ऊला में 'वो' की जगह "ये" कर लें तो उचित होगा ।

Comment by TEJ VEER SINGH on Thursday

हार्दिक बधाई आदरणीय राजेश कुमारी जी।लाज़वाब गज़ल।

हैं मुखालिफ़ कुछ हवायें हो रही कमजोर छत 
डगमगाती आपकी सरकार है कुछ कीजिये 

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