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लोकतंत्र

 

अर्जी लिए खड़ा है बुधिया,

भूखा प्यासा खाली पेट.

राजा जी कुर्सी पर बैठे,

घुमा रहे हैं पेपरवेट.

 

कहने को तो लोक तंत्र है,

मगर लोक को जगह कहाँ है.

मंतर सारे पास तंत्र के,

लोक भटकता यहाँ-वहाँ  है.

 

रोज दक्षिणा के बढ़ते हैं,

सुरसा के मुख जैसे रेट.

 

राजकुँवर जी की मर्जी है,

टोपी पहनें या फिर पगड़ी.

सारी परजा बाँट रखी है,

कुछ है पिछड़ी, कुछ है अगड़ी.

 

बारी-बारी से करते हैं,

मिल जुल कर सबका आखेट.

 

साइड में हो जाना प्यारे,

जब भी वो निकलें बाजू से.

आलू प्याज अगर मँहगे हों,

काम चला लेना काजू से.

 

कच्छा बनियान बहुत है तुमको,

उनको आवश्यक जाकेट.

 

गठबंधन की गाँठ न टूटे,

नवसिखियों को सिखा रहे हैं.

जिनके पास न धरती उनको,

स्वप्न गगन के दिखा रहे हैं.

 

लोक छुहारा हुआ सूख कर,

हुआ तंत्र का दुगुना वेट.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 22, 2018 at 10:43am

 आदरणीय Naval Kishor Soni जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 21, 2018 at 6:17pm

आ. भाई बसंत जी, लोकतंत्र को बेहतरीन ढंग से उजागर किया है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 4:56pm

गठबंधन की गाँठ न टूटे,

नवसिखियों को सिखा रहे हैं.

जिनके पास न धरती उनको,

स्वप्न गगन के दिखा रहे हैं.

लोक छुहारा हुआ सूख कर,

हुआ तंत्र का दुगुना वेट.
वाह आदरणीय बसंत जी वाह ... वर्तमान के हालात को जीते इस सुंदर नवगीत के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Naval Kishor Soni on August 21, 2018 at 12:17pm

आज के 'लोक' एवं 'तन्त्र' पर सटीक लेखन, बधाई आपको !

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 21, 2018 at 9:48am

 आदरणीया KALPANA BHATT ('रौनक़') जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 20, 2018 at 8:19pm

बहुत अच्छा नवगीत लिखा है आपने आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी| हार्दिक बधाई|

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 20, 2018 at 7:52pm

आदरणीय समर कबीर जी सादर नमस्कार, आपका आशीष पाकर सार्थक हुआ लेखन, साद नमन आपको 

Comment by Samar kabeer on August 20, 2018 at 6:51pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत अच्छा नवगीत लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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