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"बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ"

ग़ज़ल

बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ

मैं नफ़रतों का ही क़िस्सा तमाम करता चलूँ

अब आख़िरत का भी कुछ इन्तिज़ाम करता चलूँ

दिल-ओ-ज़मीर को अपने मैं राम करता चलूँ

जहाँ जहाँ से भी गुज़रूँ ये दिल कहे मेरा

तेरा ही ज़िक्र फ़क़त सुब्ह-ओ-शाम करता चलूँ

अमीर हो कि वो मुफ़लिस,बड़ा हो या छोटा

मिले जो राह में उसको सलाम करता चलूँ

गुज़रता है जो परेशान मुझको करता है

तेरे ख़याल से कैसे कलाम करता चलूँ

"समर"हयात का मक़सद बना लिया है यही

चलन वफ़ा का ज़माने में आम करता चलूँ

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on October 11, 2018 at 10:49pm

जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 11, 2018 at 7:51pm

वाह वाहबेहतरीन अशआर। दिली मुबारकबाद जनाब समर कबीर साहब!

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 7, 2018 at 11:10pm

यही तो आपका बड़प्पन है..शुक्रिया आदरणीय..

Comment by Samar kabeer on October 7, 2018 at 7:00pm

जनाब बृजेश जी आदाब,सुख़न नवाज़ी लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

आइन्दा आपको शिकायत नहीं होगी ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 7, 2018 at 3:30pm

वाह जी वाह आदरणीय क्या ही शानदार ग़ज़ल कही हर एक शेर बेमिसाल..एक गुजारिश है आदरणीय....अगर आप बड़े लोग अपनी रचनाओ के साथ मापनी लिखेंगे तो हमें सीखने में और आसानी रहेगी।क्योंकि सभी मापनियों की जानकारी नहीं है अभी।

Comment by Samar kabeer on September 27, 2018 at 5:33pm

जनाब आलोक रावत साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए शुक्रगुज़ार हूँ आपका ।

Comment by Alok Rawat on September 27, 2018 at 4:49pm

आदरणीय समर कबीर साहब, जनाब शादाब लाहौरी की ज़मीन में बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने

गुज़रता है जो परेशान मुझको करता है

तेरे ख़याल से कैसे कलाम करता चलूँ

बहुत ही बेहतरीन है।
आपको बहुत बहुत मुबारक़बाद

Comment by Samar kabeer on September 27, 2018 at 12:11am

जनाब डॉ.छोटेलाल सिंह जी आदाब,सुख़न नवाज़ी और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on September 26, 2018 at 8:26pm

परमादरणीय समर साहब आपकी काबिलियत को नमन आपकी कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा अनूठी है हम आपको पढ़कर गौरवान्वित होते हैं आप जैसे लोग साहित्य जगत में कम हैं

Comment by Samar kabeer on September 17, 2018 at 11:00pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

एक ग़ज़ल 14 सितम्बर को पोस्ट की है, समय मिले तो उसे भी देख लें ।

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