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शह्र अपना है बंट गया देखो------ग़ज़ल

2122 1212 22

शह्र अपना ये बँट गया देखो
सिम्बलों से लिपट रहा देखो

देश की फिक्र की सजी अर्थी
जाति का है कफ़न चढ़ा देखो

अब सभी को ख़याल बस अपना
संकुचित दायरा हुआ देखो

बस वहीं पर ही बन रहे रिश्ते
है जहाँ कोई फ़ायदा देखो

जाति बस काहिलों का है मुद्दा
जो था इंसाँ सफल हुआ देखो

कर्म करने का नाम जीवन है
साफ गीता में यह लिखा देखो

दर्द के या खुशी के हों आँसू
शेर पंकज नें कर दिया देखो

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 20, 2018 at 11:13pm

आ. भाई पंकज जी, उम्दा गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Ajay Tiwari on September 20, 2018 at 5:44pm

आदरणीय पंकज जी, अच्छे अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

दर्द या के खुशी के हों आँसू > दर्द के या खुशी के हों आँसू

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on September 20, 2018 at 4:17pm

आद0 पंकज कुमार मिश्रा जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल आपके हवाले से पढ़ने को मिली। शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल करें। सादर

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 20, 2018 at 3:04pm

आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, कफ़्न रेख्ता पर चेक कर के लिखा है मैंने, लेकिन आपका सुझाव गलत नहीं हो सकता।

जल्दी ही सुधारता हूँ

Comment by Samar kabeer on September 20, 2018 at 3:01pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

'शह्र अपना है बँट गया देखो'

इस मिसरे में 'है' की जगह "ये" करना" उचित होगा ।

जाति का कफ़् चढ़ चुका देखो'

इस मिसरे में ' कफ़्न'ग़लत शब्द है,सहीह शब्द है "कफ़न",मिसरा बदलने का प्रयास करें ।

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