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कुछ क्षणिकाएं :

कुछ क्षणिकाएं :

पिघलती नहीं
अब
अंतर्मन की व्याकुलता
आँखों से
स्वार्थ का चश्मा
सोख लेता है
सारा दर्द

................

सीख लिया है
आँखों ने
खारा पानी पीना
संवेदनहीन

हो गया है
वर्तमान

.........................

झीलें नहीं होती
भावों की
आँखों में
मैच कर लेता है
हर अंतरंग का रंग
कांटेक्ट लेंस

.....................

मुद्दत हो गई
खुद से मुलाकात हुए
शायद
उनसे बिछुड़ने का
अंजाम है ये
पलक से गिरा
लकीरों पे
किसी याद का
मुकाम है ये

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:39pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी , सृजन आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:39pm

आदरणीय शेख उस्मानी साहिब , आदाब .... सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on September 26, 2018 at 11:51am
आदरणीय सुशील सरना जी जीवंत क्षणिकाएं पढ़कर बहुत आनन्द की अनुभूति हुई दिली मुबारकबाद
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on September 25, 2018 at 8:27pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन क्षणिकाएँ लिखी आपने। बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Samar kabeer on September 24, 2018 at 11:53am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा क्षणिकाएँ हुई हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

झीलें नहीं होती---"झीलें नहीं होतीं"

Comment by narendrasinh chauhan on September 22, 2018 at 2:01pm

वाह... बहोत खूब सुंदर रचनाए। .. 

 सुशील सरना जी हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 22, 2018 at 12:04pm

वाह्ह्ह बहुत सुंदर बेहतरीन सृजन आद० सुशील सरना जी हार्दिक बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 21, 2018 at 7:37pm

आ. भाई सुशील जी, बेहतरीन रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 21, 2018 at 5:13pm

वाह। ग़ज़ब का सृजन! व्याकुलता/ संवेदनहीनता/भावरंगहीनता/आत्मावलोकन उपेक्षा पर स्वार्थलोलुपता का हावी होना बाख़ूबी उभारा गया है। सादर हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय सुशील सरना  साहिब।

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