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ग़ज़ल...लाज की मारी न रोये द्रोपदी

इस ग़ज़ल के साथ ओबीओ परिवार को नवरात्री की शुभकामनाएं.. जय माता की
फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन

हर कली में देवियों का वास हो
पत्थरों को दर्द का अहसास हो

फिर कोई अवतार आये भूमि पे
निश्चरों को मृत्यु का आभास हो

लाज की  मारी न रोये  द्रोपदी
अब नहीं वैदेही को वनवास हो

पीर की तासीर जाओगे समझ
लुट चुका कोई तुम्हारा खास हो

बात इतनी सी समझते क्यों नहीं
घात मिलती है जहाँ बिस्वास हो
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 14, 2018 at 7:35pm

नमन संग आभार स्वीकार करें आदरणीय लक्ष्मण धामी जी...सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 14, 2018 at 7:35pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी बहुत बहुत आभार स्वीकार करें..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 3:03pm

आ. भाई बृजेश जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 13, 2018 at 11:03am

आद0 बृजेश कुमार ब्रज जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल प्रस्तुत की आपने। नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं आपको भी। बधाई

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2018 at 12:41pm

ऐसा कह के शर्मिंदा न करें आदरणीय..मैं समझ गया था नजर की चूक है।

Comment by Samar kabeer on October 12, 2018 at 11:57am

क्षमा !

मैं 'घात' को "घाव" पढ़ गया ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2018 at 11:49am

हाँ आदरणीय घाव शब्द पुल्लिंग है लेकिन मैंने घात का प्रयोग किया है जो कि स्त्रीलिंग है।सादर

Comment by Samar kabeer on October 12, 2018 at 10:47am

उम्दा बदलाव, बधाई ।

'घात मिलती है जहाँ बिस्वास हो'

'घाव' शब्द पुल्लिंग है, इसलिये 'मिलती' को "मिलता" कर लें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2018 at 10:33am

आदरणीय समर जी बदलाव पे गौर फरमायें...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 11, 2018 at 10:44pm

स्वागत है आदरणीय सतविंद्र जी..

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