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"तरही ग़ज़ल नम्बर 4

नोट:-

तरही मुशायरा अंक-100 में 87 ग़ज़लें पोस्ट हुईं,मेरी इस ग़ज़ल में जो क़वाफ़ी इस्तेमाल हुए हैं वो बिल्कुल नये हैं ।

पहले सिल पर घिसा गया है मुझे

फिर जबीं पर मला गया है मुझे

जाल हूँ इक सियासी लीडर का

नफ़रतों से बुना गया है मुझे

कोई बारूद की तरह देखो

सरहदों पर बिछा गया है मुझे

कहदो तक़दीर से बखेरे नहीं

करके वो एक जा गया है मुझे

क़त्ल करने के बाद ख़्वाबों का

देके वो ख़ूँबहा गया है मुझे

हक़ किसी और का नहीं उस पर

दिल वो करके हिबा गया है मुझे

दर्द बढ़ता ही जा रहा है,"समर"

कैसी देकर दवा गया है मुझे

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by नादिर ख़ान on October 27, 2018 at 5:14pm

पहले सिल पर घिसा गया है मुझे

फिर जबीं पर मला गया है मुझे

जाल हूँ इक सियासी लीडर का

नफ़रतों से बुना गया है मुझे

आदरणीय समर कबीर साहब आपकी गज़लगोई के हम सब कायल है आप  कुछ न कुछ नया प्रयोग भी  अपनी गज़लों में करते रहते हैं जैसा की पहली गज़ल में आपने किया था और इस दफा आपने नए क़वाफ़ी के साथ उम्दा गज़ल कही।  आपकी हर गज़ल सीखने के एतबार से मुकम्मल किताब होती है  । बहुत मुबारकबाद आपको .......देरी   से गज़ल में आने के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ ।

Comment by Ravi Shukla on October 27, 2018 at 10:50am

आदरणीय समर साहब इस गजल के लिए भी बहुत बहुत बधाई आपको वाकई आपने कमाल कर दिया शेर दर शेर मुबारकबाद कुबूल करें

Comment by राज़ नवादवी on October 26, 2018 at 5:02pm

आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब अर्ज़ है. बहुत ख़ूब, बहुत शानदार. 

कोई बारूद की तरह देखो

सरहदों पर बिछा गया है मुझे

क्या कहने, दिल से मुबारकबाद. सादर. 

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 26, 2018 at 1:23pm

धन्य हो प्रभू । 

आपकी ग़ज़ल को नमन करता हूँ । ग़ज़ल के प्रति इतना गहरा समर्पण अब दुर्लभ है । 

हर शेर अपने आप में नए काफ़िया के साथ एक नई जमीन का मंजर दिखाता है । 

आपन तेज सम्हारो आपै .......

    सादर नमन गुरुदेव । 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 25, 2018 at 12:48pm

वाह वाह आ. समर सर ..
एक मिसरे पर चार ग़ज़लें और सभी बेहतरीन... 
बहुत बहुत बधाई 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 25, 2018 at 11:17am

पहले सिल पर घिसा गया है मुझे

फिर जबीं पर मला गया है मुझे

वाह वाह वाह, क्या मतला कहा आपने,, ग़ज़ब

क़त्ल करने के बाद ख़्वाबों का

देके वो ख़ूँबहा गया है मुझे

वाह, वाह

हक़ किसी और का नहीं उस पर

दिल वो करके हिबा गया है मुझे

गज़ब का शैर, वाह

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। एकहीँ जमीन पर खुद में चार गज़ले कहना और वो भी 87 गजलों में आये क्वाफी को छोड़कर,, यह आपके बस की ही बात है। आपके कुछ नया करने के जुनून को देखकर हमें भी ऊर्जा मिलती है। इस बेहतरीन ग़ज़ल पर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर


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Comment by rajesh kumari on October 25, 2018 at 10:19am

वाह्ह्ह्ह वाह्ह्ह आद० समर भाई जी ये ग़ज़ल तो सबसे उम्दा हुई सभी काफिया नए हैं 

कोई बारूद की तरह देखो

सरहदों पर बिछा गया है मुझे--कमाल का शेर 

वैसे सभी शेर ऐक से बढ़कर एक हैं 

दिल से दाद हाज़िर है मुबारकबाद देती हूँ 

Comment by Mahendra Kumar on October 25, 2018 at 9:19am

वाह! एक ही ज़मीन पर इतनी सारी ग़ज़लें होने के बाद भी नये क़वाफ़ी ले के आना अपने आप में ही बहुत बड़ी बात है। उस पर इतने अशआर निकालना केवल आप ही के बस की बात है। बहुत ख़ूब सर। इस शानदार ग़ज़ल पर मेरी तरफ़ से भी ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 25, 2018 at 9:04am

हार्दिक बधाई आदरणीय समर कबीर साहब जी।बेहतरीन गज़ल।

जाल हूँ इक सियासी लीडर का

नफ़रतों से बुना गया है मुझे

Comment by Surkhab Bashar on October 25, 2018 at 8:04am

मोहतरम  समर कबीर साहब बहुत अनछूऐ क़फीयों का इस्तेमाल किया 

उम्दा ग़ज़ल  के लिये मुबारक बाद कुबूल करें

कृपया ध्यान दे...

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