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ग़ज़ल (यूँ ही तो न मायूस हम हो गए)

ग़ज़ल (यूँ ही तो न मायूस हम हो गए)
(फ ऊलन _फ ऊलन _फ ऊलन _फ अल)

यूँ ही तो न मायूस हम हो गएl
अचानक सितम उनके कम हो गए l

ज़माने की नाकाम साज़िश हुई
वो मेरे हुए उनके हम हो गए l

खिलाफे सितम क्या सुखनवर लिखें
बिकाऊ जब उनके क़लम हो गए l

हुकूमत बचा ज़ुल्‍म की संग दिल
सभी अब खिलाफे सितम हो गए l

कोई आ गया आख़री वक़्त क्या
सभी खत्म दिल के अलम हो गए l

यूँ ही तो न यारों को हैरत हुई
मेरी रह पे उनके क़दम हो गए l

अज़ीज़ों का तस्दीक है ये करम
नहीं बद गुमां यूँ सनम हो गए l

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on Thursday

जनाब ब्रजेश कुमार साहिब  , ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Wednesday

बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीय तस्दीक जी..

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 16, 2019 at 9:01am

मुहतरम जनाब समर साहिब आ दाब, ग़ज़ल पर आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I आपका का कहना सही है

मिसरा यूँ कर लिया है "हमारे वो और उनके हम हो गए" 

Comment by Samar kabeer on March 16, 2019 at 7:46am

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'वो मेरे हुए उनके हम हो गए'

इस मिसरे में शुतरगुरबा ऐब है,देखियेगा ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 14, 2019 at 10:09pm

जनाब भाई लक्ष्मण धा मी साहिब , ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2019 at 8:48pm

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

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