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प्रतीक्षा लौ ...

प्रतीक्षा लौ ...

जवाब उलझे रहे
सवालों में
अजीब -अजीब

ख्यालों में
प्रतीक्षा की देहरी पर
साँझ उतरने लगी
बेचैनियाँ और बढ़ने लगीं
ह्रदय व्योम में
स्मृति मेघ धड़कने लगे
नैन तटों से
प्रतीक्षा पल
अनायास बरसने लगे
सवाल
अपने गर्भ में
जवाबों को समेटे
रात की सलवटों पर
करवटें बदलते रहे
अभिव्यक्ति
कसमसाती रही
कौमुदी
खिलखिलाती रही
संग रैन के
मन शलभ के प्रश्न
बढ़ते रहे
जवाब
प्रतीक्षा लौ में
जलते रहे


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 38

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Comment by Sushil Sarna on April 26, 2019 at 6:04pm

आदरणीय amod shrivastav (bindouri)जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on April 26, 2019 at 6:03pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by amod shrivastav (bindouri) on April 26, 2019 at 12:16pm

आ सुसील सर प्रणाम
सर कविता के लिए दिली बधाई। ...
अपने गर्भ में
जवाबों को समेटे
रात की सलवटों पर
करवटें बदलते रहे..... बेहद भाव पूर्ण रचना

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 25, 2019 at 4:40pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन और भावपूर्ण रचना पर बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Sushil Sarna on April 24, 2019 at 6:06pm

आदरणीय  narendrasinh chauhan जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on April 24, 2019 at 6:06pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , ... सृजन के भावों आत्मीय प्रशंसा से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by narendrasinh chauhan on April 23, 2019 at 8:41pm

खुब सुन्दर रचना सर

Comment by Samar kabeer on April 23, 2019 at 3:44pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता हुई,बधाई स्वीकार करें ।

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