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इक ही दिन काफ़ी नही है - ग़ज़ल

मातृ-दिवस विशेष

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2122/ 2122/2122/212

इक ही दिन काफ़ी नही है ममता के सम्मान को
कम पड़ेंगे सौ जनम भी, माँ तेरे गुणगान को

जो बना देती है क़ाबिल एक नन्हीं जान को
है ज़रूरत माँ कि ममता की बहुत इंसान को

लाख लानत भेजिए उस सरफिरे नादान को
माँ को खुद से दूर करके ढूँढे जो भगवान को

माँ का दिल इससे बड़ा है जिसमें तुम रहते मियाँ
नाज़ से देखो न अपने बंग्ले आलीशान को

गाड़ी बंग्ले पैसे ज़ेवर उसको कुछ भी मत दिखा
देखकर खुश होती है माँ बस तेरी मुस्कान को

पहले उसको मानाे यारों सीख माँ से जो मिली
बाद में पढ़ लेना चाहे गीता को क़ुरआन को

घोलती थी आँखों में जो मीठी सी नीदें कभी
याद करता हूँ मैं अब भी उस सुरीली तान को

आ चली आ बादलों के देश से फिर तू यहाँ
मीठी सी झिड़की सुना दे अपने इस शैतान को

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गजेन्द्र श्रोत्रिय

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 48

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Monday

आ. भाई गजेंद्र जी, माँ को समर्पित सुंदर गजल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Hariom Shrivastava on May 15, 2019 at 8:46pm

वाह,वाहहह,माँ को समर्पित लाजवाब ग़ज़ल कही आदरणीय गजेन्द्र जी।

Comment by Sushil Sarna on May 13, 2019 at 5:01pm

वाह आदरणीय गजेंद्र जी माँ को समर्पित बहुत ही भावुक,सृजन प्रस्तुत किया है आपने। माँ शब्द के अंतर् में ऐसी गूँज है जो अंबर को भी हिला देती है। इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई।

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