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वर्तमान राजनैतिक व्यवस्ठा पर तंज

वक्त दोहराता है अपने आप को
कैसे कैसे दिन दिखाता आपको

भूलना हम जिसको चाहें बारहा
फिर वही मंज़र दिखाता आपको

जो सबक माज़ी में तुम भूले उसे
याद फिर-फिर से दिलाता आपको

जिस के संग जैसा किया है सामने
वक्त बस शीशा दिखाता आपको

शह नहीं है खेल बस शतरंज का
मात वो देना सिखाता आपको

तुम अगर सच्चे थे तब वो आज है
फिर वो क्यूँ झूठा कहाता आपको

सांच को ना आंच होती है कभी
वक्त ये खुद ही सिखाता आपको

जो शज़र बोता बबूल का ‘प्रदीप’
कांटे भी वो ही चुभाता आपको

-प्रदीप देवीशरण भट्ट- मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on August 25, 2019 at 3:40pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,ग़ज़ल अभी समय चाहती है,बहरहाल बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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"बेहतरीन बाल गीत, बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सतविन्द्र सरजी। "
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"सराहना हेतु आभार आदरणीया बबिता गुप्ता जी."
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