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ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

221   2121   1221   212

मुझको तेरे रहम से मयस्सर तो क्या नहीं
जिस और खिड़कियां है उधर की हवा नहीं

हमको तो तेरी खोज में बस ये पता चला
तेरा पता बस इतना है तू लापता नहीं

उसने तमाम गीत लिखे औरों के लिए
फिर भी वो मेरे दिल के लिए बेवफा नहीं

यूं तो तमाम लोग तरक्की पसंद है
मैं इश्क से अलग कभी कुछ लिख सका नहीं

वह इसलिए ही जीत के बेहद करीब है
क्या-क्या कुचल गया है कभी सोचता नहीं

सबका गुनाहगार हूं ये मानता हूं पर
मेरा नसीब मेरी कलम ने लिखा नहीं

अच्छे के साथ अच्छा नहीं होता है सलूक
मैं चाहता हूं कह दूं जहां में खुदा नहीं

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 87

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Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 26, 2019 at 3:40pm

:प्रिय मनोज अच्छे खयालात....

वह इसलिए ही जीत के बेहद करीब है

कितने कुचल गये हैं ये उसको पता नहीं

अच्छों के साथ अच्छा हो ज़रुरी नहीं 'मनोज'

कहने को तो मैं कह दूँ जहाँ में खुदा नहीं

Comment by Manoj kumar Ahsaas on August 26, 2019 at 3:16pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब

Comment by Samar kabeer on August 25, 2019 at 3:52pm

जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'मुझको तेरे रहम से मयस्सर तो क्या नहीं '

इस मिसरे में 'रहम' शब्द ग़लत है,सहीह शब्द "रह्म" है और इसका वज़्न 21 होता है,आप यहाँ "करम" शब्द ले सकते हैं ।

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