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अहसास की ग़ज़ल -मनोज अहसास

2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2

अपने ही पापों से मन घबराता है
सीने में इक अपराधों का खाता है

लाचारी से कुछ भारी है मजबूरी
आँखों में ताकत है देख न पाता है

उसकी मजबूरी समझूँ या अपना दुख
गुलशन से सहरा में कोई आता है?

लाख कोशिशें कर के माना है हमनें
जो होना है आखिर वो हो जाता है

दिल मे कोई भीड़ सलामत है लेकिन
तेरा चेहरा साफ नहीं दिख पाता है

क्या जाने अफसाना है या सच कोई
आखिर में जो सच की जीत बताता है

ढलता है जब सूरज अपनी भी छत पर
तब जग का अंधियार समझ में आता है

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Manoj kumar Ahsaas on June 22, 2020 at 2:38pm

ये सब कॉपी पेस्ट करने की जल्दबाज़ी का।नतीज़ा है आदरणीय

समर कबीर साहब

आपका नाम मैं कैसे भूल सकता हूँ 

आपसे तो मैंने बहुत कुछ सीखा है

सादर प्रणाम स्वीकार करें

आभार

Comment by Samar kabeer on June 22, 2020 at 2:13pm

//आदरणीय समीर साहब

हार्दिक आभार//

मेरा नाम भी भूल गए ?

Comment by Manoj kumar Ahsaas on June 21, 2020 at 3:29pm

आदरणीय समीर साहब

हार्दिक आभार

मिसरा चेक करता हूँ

सुझाव के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

सादर

Comment by Manoj kumar Ahsaas on June 21, 2020 at 3:29pm

आदरणीय सालिक जी

ग़ज़ल पर उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार

सादर

Comment by Manoj kumar Ahsaas on June 21, 2020 at 3:28pm

आदरणीय अमीर साहब

हार्दिक आभार

मिसरा चेक करता हूँ

सुझाव के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

  • सादर
Comment by सालिक गणवीर on May 30, 2020 at 4:50pm

प्रिय भाई मनोज एहसास जी

सादर नमस्कार

शानदार ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ स्वीकार करें.

दिल में कोई भीड़ सलामत है लेकिन

तेरा चेहरा साफ नहीं दिख पाता है...... वा

Comment by Samar kabeer on May 30, 2020 at 2:53pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

'लाख कोशिशें कर के माना है हमनें

ये मिसरा बह्र में नहीं,देखियेगा।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 30, 2020 at 12:52pm

जनाब, मनोज कुमार 'अह्सास' जी, आदाब। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें।

मेरा इस बह्र से साबक़ा नहीं पड़ा है। बहरहाल इस बह्र में "लाख कोशिशें कर के माना है हमनें" मिसरा बह्र में नहीं है। सादर। 

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