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दूसरों का सहारा, सहारा नही

जिंदगी का सफ़र किसको प्यारा नहीं
मौत आये किसी को गवारा नहीं

कर भलाई जो काम आएगी हर तरह
जिंदगी फिर मिलेगी दोबारा नहीं

किस तरह फिर भला मेहरबान हो कोई
तुमने दिल से उसे जब पुकारा नहीं

सूनी-सूनी हैं कश्मीर की वादियाँ
झील में अब कोई भी शिकारा नहीं

जो पहाड़ों से उतरी है गंगोजमन
लौट जाए कोई ऐसी धारा नही

खुद ही अपना सहारा बनो तो बनो
दूसरों का सहारा, सहारा नही

कैसी उलझन है क्या बात है कुछ कहो
ज़ुल्फ़ को किस लिए है सवांरा नही

मौसम आते रहे और जाते रहे
फिर भी "गुलशन" में बदला नज़ारा नही

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Comment by MAHIMA SHREE on May 23, 2012 at 9:36pm

खुद ही अपना सहारा बनो तो बनो
दूसरों का सहारा, सहारा नही

जो पहाड़ों से उतरी है गंगोजमन
लौट जाए कोई ऐसी धारा नही

वाह !!!! क्या गज़ल है ... लाजवाब...... 

.. बधाई स्वीकार करे  

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 22, 2012 at 5:48pm

आदरणीय  गुलशन   जी, सादर अभिवादन 

खुद ही अपना सहारा बनो तो बनो
दूसरों का सहारा, सहारा नही  
बहुत अच्छा सदेश , बधाई 
Comment by Yogi Saraswat on May 22, 2012 at 2:44pm

किस तरह फिर भला मेहरबान हो कोई
तुमने दिल से उसे जब पुकारा नहीं

सूनी-सूनी हैं कश्मीर की वादियाँ
झील में अब कोई भी शिकारा नहीं

ग़ज़ल के माध्यम से बहुत ही सटीक बात कही आपने ! एक एक शे'र बहुत बढ़िया !

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 22, 2012 at 11:55am
खुद ही अपना सहारा बनो तो बनो
दूसरों का सहारा, सहारा नही
waah Gulshan sahab
Comment by Rekha Joshi on May 22, 2012 at 11:30am

खुद ही अपना सहारा बनो तो बनो
दूसरों का सहारा, सहारा न|

bahut sundr gazal,Gulshan ji badhai.

Comment by आशीष यादव on May 22, 2012 at 11:27am

बहुत सुन्दर गजल। बड़े अच्छे भाव लिये हुए है। हर एक शेर तारीफ का हकदार है। मेरे तरफ से भी वाह-वाही है, वाह वाह वाह वाह।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 22, 2012 at 9:46am

सूनी-सूनी   हैं   कश्मीर   की   वादियाँ 
झील  में  अब  कोई  भी  शिकार  नहीं 
 
जो   पहाड़ों  से  उतरी   है  गंगोजमन 
लौट   जाए   कोई   ऐसी   धारा   नही

बहुत सुन्दर ग़ज़ल है ये दो शेर बहुत ख़ास लगे ....बाकी  ...कुछ टंकण मिस्टेक हैं दुरुस्त कर लें

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 22, 2012 at 9:11am

गुलशन साहब बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ....एक एक शेर दिल की गहराइरोन में उतर जा रहा है। दाद कुबूल करें। कुछ टाइपिंग मिस्टेक रह गयी है उन्हें सही कर ले (जैसे मेहरबान की जगह मेहरबाँ और शिकार की जगह शिकारा ) और मकते का ऊला मिसरा थोड़ा खटक रहा है....

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