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दुश्मनी से डर कैसा दोस्ती से डरते हैं

दुश्मनी से डर कैसा दोस्ती से डरते हैं..
खाये हैं फ़रेब इतने हर ख़ुशी से डरते हैं..

जब से आशियाँ अपना जल गया गुलिस्ताँ में..
हो कहीं उजाला हम रौशनी से डरते हैं..

हम तो धूप के राही साथ-साथ सूरज है..
जिस्म जिनके नाज़ुक हैं चाँदनी से डरते हैं..

कुछ न कुछ तो होगा ही इसलिए जहां वाले..
आदमी की सूरत में आदमी से डरते हैं..

मौसम-ए-बहारां में दिल है मुतमइन लेकिन..
हम ग़मों के मौसम की वापसी से डरते हैं..

उँगलियाँ न उठ जायें तार तार दामन पर..
शायद इस लिए "गुलशन" बेख़ुदी से डरते हैं..

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Comment by Albela Khatri on June 14, 2012 at 1:22pm


जनाब अशफ़ाक अली ( गुलशन खैराबादी)  साहेब,
बहुत ख़ूब.........

जब से आशियाँ अपना जल गया गुलिस्ताँ में..
हो कहीं उजाला हम रौशनी से डरते हैं..

हम तो धूप के राही साथ-साथ सूरज है..
जिस्म जिनके नाज़ुक हैं चाँदनी से डरते हैं..

__गज़ब के अशआर...बधाई ! 

Comment by Bishwajit yadav on June 13, 2012 at 2:35pm
प्रणाम गुलशन जी
दुश्मनी से डर कैसा दोस्ती से डरते हैं..
खाये हैं फ़रेब इतने हर ख़ुशी से डरते है
बहुत बेजोड क्या बात है
"टच माई दिल"
Comment by yogesh shivhare on June 12, 2012 at 6:37pm

कुछ न कुछ तो होगा ही इसलिए जहां वाले..
आदमी की सूरत में आदमी से डरते हैं..

 

बहुत खूब लिखा है जनाब ..आपने हकीकत को क्या खूब पेश की है

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on June 12, 2012 at 4:20pm

janab mohtram ashfaq saaheb is khoobsoorat ustadaana kalam ke liye dil se mubarakbaad pesh karta hoon kubool kijiye

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 12, 2012 at 3:02pm

आदरणीय गुलशन जी , सादर 

बहुत सुन्दर भावों से सजी गजल कहते हैं 

एक नजर हम पे भी कभी पड़ोस में रहते हैं 

बधाई.

Comment by Arun Sri on June 12, 2012 at 10:21am

हम तो धूप के राही साथ-साथ सूरज है..
जिस्म जिनके नाज़ुक हैं चाँदनी से डरते हैं..

वाह ! वाह ! क्या उम्दा गज़ल कही ! बहुत बढ़िया !

Comment by Yogi Saraswat on June 12, 2012 at 10:20am

कुछ न कुछ तो होगा ही इसलिए जहां वाले..
आदमी की सूरत में आदमी से डरते हैं..

क्या बात है श्री असफाक अली साब ! बहुत बढ़िया ग़ज़ल ! एक एक अश'आर खूबसूरत !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 12, 2012 at 9:17am

waah waah ..................bahut khoob ,daad kubool kijiye aadarneey

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 11, 2012 at 11:16pm

आपके इस गज़ल की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं है मेरे पास

असफाक जी. जो भाव मेरे मन में दुष्यंत जी के लिए है

वही भाव आपके प्रति है. आपकी सभी गजलें मन को भाती हैं

आपका आभार बहेतरीन ग़ज़लों के लिए

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