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ख़ुल्द को ख़ुल्द के बीमार सम्भाले हुए हैं
ज़ीस्त को मौत के आसार सम्भाले हुए हैं।

मीर तो दर्द का अम्बार सम्भाले हुए हैं
और ग़ालिब को परस्तार सम्भाले हुए हैं

ज्यूं निज़ामत को गुनहगार सम्भाले हुए हैं
इश्क़ को उसके गिरफ़्तार सम्भाले हुए हैं।

कोई कह दे कि तलबगार सम्हाले हुए हैं
मैकदों को सभी ग़मख़्वार सम्हाले हुए हैं।

अपनी महराबे-अना से ही दीवाने तेरे
आसमाँ की दरो-दीवार सम्भाले हुए हैं।

शेखर
मौलिक व् अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 13, 2014 at 11:13pm

शिल्प के हिसाब से अच्छा प्रयास हुआ है. मतलाओं के समाज में अलत्ता एक शेर जगह बना ही गया.

बहुत खूब !

दाद कुबूल कीजिये भाईजी..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 3, 2014 at 11:18am

अपनी महराबे-अना से ही दीवाने तेरे
आसमाँ की दरो-दीवार सम्भाले हुए है

अति सुंदर  I


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 8:20pm

आदरणीय चन्द्र शेखर भाई , बढिया गज़ल कही है , दिली बधाई स्वीकार करें ।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 1, 2014 at 10:12am

बेहतरीन गजल.....बधाई आदरणीय शेखर जी

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2014 at 5:09pm

बेह्तरीईईईईईईन  

Comment by Sushil Sarna on October 31, 2014 at 11:47am

कोई कह दे कि तलबगार सम्हाले हुए हैं
मैकदों को सभी ग़मख़्वार सम्हाले हुए हैं। .... इस शानदार ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by Shyam Narain Verma on October 31, 2014 at 11:34am

सुन्दर गज़ल .... सादर बधाई.....

Comment by umesh katara on October 30, 2014 at 9:43pm

waaaaaaaaaaaaah

Comment by Baidyanath Saarthi on October 30, 2014 at 9:04pm

आसमाँ की दरो-दीवार सम्भाले हुए हैं।... क्या गज़ब का मिसरा है ..! उम्दा ..बहुत बधाई जनाब !

कृपया ध्यान दे...

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