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मुहब्बत में कोई रिश्ता नहीं देखा
परिंदा क़ैद में उड़ता नहीं देखा।

वफ़ा को क़ैद कहना है ख़िरदमंदी
ख़िरदमंदों को कुछ जँचता नहीं देखा।

सुनो फ़ितरत तो कुदरत ही बनाती है
शरीफों को कभी गिरता नहीं देखा।

ये आशिक़ सब के सब जैसे ज़नाना हैं
इन्हें हर बात पे रोता नहीं देखा?

बनाए रास्तों पर क्या चलें शेखर
फ़लक पे मैंने तो रस्ता नहीं देखा!

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 25, 2014 at 3:55pm

आदरणीय  चंद्रशेखर जी सभी अशार सुंदर हैं इस सुंदर ग़ज़ल के लिए  तहे दिल बधाई सादर 

Comment by Ketan Kamaal on November 25, 2014 at 12:18pm

Zindabad Zindabad Mere bhai Chandra Shekhar Pandey JI kya kahne 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 24, 2014 at 11:08am

सुन्दर गजल i  बधाई i

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on November 24, 2014 at 10:32am

niceee

Comment by vijay nikore on November 24, 2014 at 9:13am

अच्छी गज़ल के लिए बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 24, 2014 at 5:46am

आ. चंद्र शे खर भाई , बढ़िया ग़ज़ल के लिये बधाई !


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2014 at 4:20pm

आदरणीय चंद्रशेखर जी, सभी अशआर अच्छे लगें, दाद कुबूल करें।

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