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दहाने-ज़ख्म में वो कील कर के बैठ गया
वफ़ा की खुश्बुओं की झील कर के बैठ गया।

न कर सका जो अपने ख़्वाब की तरफदारी
वो अपनी अक़्ल को वकील कर के बैठ गया

नशा चढ़ा है सुर्खियों का इस क़दर उसको
कि अपने आप को जलील कर के बैठ गया।

फिर आज दिल ने मुझ को कू ए यार में टोका
फिर आज उससे मैं दलील कर के बैठ गया।

तुम्हारे बाद हिज़्र की हमारी हर शब को
फ़लक कुछ और ही तवील कर के बैठ गया।

वफा की राह तो थी दश्ते-कर्बला 'शेखर'
वो हक़ की चाह को सबील कर के बैठ गया।
शेखर

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 2, 2014 at 9:58pm

आदरणीय, मैं ग़ज़ल का समझदार नहीं हूँ फिर भी कहना चाहूंगा कि यह रचना पढ़ने में अच्छी लगी.....यह निश्चित रूप से आपकी सफलता है.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2014 at 9:31pm

आ. चन्द्र शेखर भाई , लाजवाब गज़ल के लिये बधाई स्वीकार करें ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2014 at 10:28am

शिल्प को गुनी-जन जाने पर आपकी गजल बहुत उम्दा  हुयी है  i पुर असर i


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 30, 2014 at 4:30pm

आदरणीय चंद्रशेखर पाण्डेय जी, पूर्व की तरह यह ग़ज़ल भी अच्छी हुई है, चौथे शेर में तक़ाबुले रदीफ़ ऐब प्रतीत होता है, बधाई कुबूल कर लेंगे, आपकी अन्य रचनाएँ और साथियों की रचनाओं पर आपकी टिप्पणी का इन्तजार रहेगा।

Comment by Shyam Narain Verma on November 29, 2014 at 9:57am

इस सुन्दर ग़ज़ल पर दाद कबूलें

Comment by Hari Prakash Dubey on November 28, 2014 at 11:50pm

सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई चन्द्र शेखर पाण्डेय जी !

कृपया ध्यान दे...

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