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ख़ुश गावों की गलियों में अब मेरा मन नहीं लगता

तुम्हारे बिन यहाँ जीना कोई जीवन नहीं लगता

पहले ग़ैरों की आहट भी तो अपनी सी ही लगती थी

अब तो अपनों की आहट में भी अपनापन नहीं लगता ,-१ 

बदल गई ये गलियाँ , अब ये शहर बेगाना लगता है

जो कुछ जाना पहचाना था , वो भी अनजाना लगता है

ये टूटी-फूटी नज़्में सब , फ़िर तुम्हें कबीर बताती हैं

तुम बिन इस दुनिया में जीना , बस एक फ़साना लगता है ,-२ 

" मौलिक व अप्रकाशित "

- शिव कुमार पटेल 

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Comment by Shiv Kumar Patel on June 1, 2015 at 1:49pm
Aabhar , aadaraniya Mithilesh Ji !

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 29, 2015 at 11:09pm

आदरणीय शिवकुमार जी 

इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई 

Comment by Shiv Kumar Patel on May 29, 2015 at 9:48am

हौसलाअफजाई करने का शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी ! 

Comment by Shiv Kumar Patel on May 29, 2015 at 9:46am

आभार आदरणीय सौरभ जी !

Comment by Samar kabeer on May 29, 2015 at 12:22am
जनाब शिव कुमार पटेल जी,आदाब,अच्छे मुक्तक लिखे हैं आपने ,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 28, 2015 at 9:45pm

इस मंच पर आपका स्वागत है, भाई शिव कुमारजी..

Comment by Shiv Kumar Patel on May 28, 2015 at 9:07pm

सादर धन्यवाद व आभार आ० केवल प्रसाद जी !

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 28, 2015 at 8:37pm

आ0 पटेल भाई जी,  सुंदर प्रयास के लिये बधाई स्वीकारे. सादर

कृपया ध्यान दे...

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