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1212 1122 1212 22
तड़पने वाले को हरगिज़ न ख़ून देते हैं
ये हैं वो लोग जो सबको जूनून देते हैं

ख़ुदा को देख सकें इनमें वो नज़र ही नहीं
बुतों को देख के दिल को सुकून देते हैं

जो दम लिया तो फ़लक गिर न जाएगा नीचे
हमारे हौसले इसको सुतून देते हैं

धधकना दिल के भी शोलों का यूं ज़रूरी है
ये फ़स्ले -दर्द को इक मानसून देते हैं

बढ़ा है शाम को दर्दे जिगर कुछ ऐसे 'शम्स'
सितारे मर्ग़ का हमको शुगून देते हैं .

शेखर 'शम्स'
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on July 17, 2015 at 11:20am
आदरणीय मिथिलेश भाई
इस सहृदयता और विशद टिप्पणी का हार्दिक आभार
Comment by दिनेश कुमार on July 16, 2015 at 4:17pm
धधकना दिल के भी शोलों का यूं ज़रूरी है
ये फ़स्ले -दर्द को इक मानसून देते हैं...
क्या ग़ज़ल कही है शेखर साहब... दिल से दाद स्वीकारें।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 16, 2015 at 1:54pm

आदरणीय शेखर जी बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल हुई है, शेर दर शेर दाद कुबूल फरमायें.

तड़पने वाले को हरगिज़ न ख़ून देते हैं
ये हैं वो लोग जो सबको जूनून देते हैं........... बेहतरीन मतला 

ख़ुदा को देख सकें इनमें वो नज़र ही नहीं
बुतों को देख के दिल को सुकून देते हैं...... क्या खूब कहा है. वाह वाह 

जो दम लिया तो फ़लक गिर न जाएगा नीचे
हमारे हौसले इसको सुतून देते हैं............... आहा क्या शानदार शेर हुआ है ... हासिल-ए-ग़ज़ल .. दिल से दाद हाज़िर है इस शेर पर 

धधकना दिल के भी शोलों का यूं ज़रूरी है
ये फ़स्ले -दर्द को इक मानसून देते हैं...... वाह वाह उम्दा शेर .. कहन की नजाकत खूब है 

बढ़ा है शाम को दर्दे जिगर कुछ ऐसे 'शम्स'
सितारे मर्ग़ का हमको शुगून देते हैं .............. बहुत बढ़िया मक्ता 

वाह वाह वाह....

सादर 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on July 15, 2015 at 12:59am
आदरणीय सुशील सर
बहुत बहुत धन्यवाद
Comment by Sushil Sarna on July 14, 2015 at 7:57pm

वाह वाह और वाह ही कहेंगे इन खूबसूरत अहसासों से लबरेज़ अशआर वाली ग़ज़ल के लिए ''धधकना दिल के भी शोलों का यूं ज़रूरी है
ये फ़स्ले -दर्द को इक मानसून देते हैं
गज़ब के अहसास पिरोये हैं आपने … हार्दिक बधाई आदरणीय जी।

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on July 14, 2015 at 2:18pm
1212 1122 1212 22

भैया यह रहा वज़्न। बहुत दिनों बाद इधर आया तो भूल गया कि वज़्न भी लिखना है

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 14, 2015 at 1:56pm

आदरणीय चन्द्र शेखर जी,

आप मंच के पुराने सदस्य और मेरे अग्रज है इसलिए क्षमा सहित एक निवेदन है ग़ज़ल की बह्र या वज्न अवश्य लिख दीजिये, पाठकों को सहजता होगी. उसके बाद ही पाठक ग़ज़ल का लुत्फ़ भी ले सकेंगे और प्रतिक्रिया भी दे सकेंगे. सादर 

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