For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

2122 1122 1122 22

अपनी आँखों से ये मंज़र नहीं देखे जाते

हाथ में अपनों के खंजर नहीं देखे जाते

दुश्मनी की भी कोई हद तो मुक़र्रर कर दो

इन गरीबों के जले घर नहीं देखे जाते

बातों ही बातों में शमशीर निकल जाती है

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

खूबसूरत हैं बहुत आपकी प्यारी आँखें

गम के है इनमें जो सागर नहीं देखे जाते

याद गावों की मुझे अब भी सताती है बहुत

अपने पुरखों के ये खण्डर नहीं देखे जाते

हादसे रोज़ ही होते हैं यहाँ पर नादिर

फिर भी क्यूँ तुमसे ये मंज़र नहीं देखे जाते

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 252

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by नादिर ख़ान on October 4, 2015 at 6:56pm

आदरणीय मदन मोहन जी ,श्याम नारायण जी एवं गिरिराज जी हौसला अफजाई का बहुत शुक्रिया .....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2015 at 1:07pm

लाजवाब ! हर शे र बेमिसाल कहे हैं , दिली मुबारक बाद कुबूल करें , आदरणीय नादिर भाई ।

Comment by Shyam Narain Verma on September 30, 2015 at 5:12pm
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।
Comment by Madan Mohan saxena on September 30, 2015 at 2:15pm

दुश्मनी की भी कोई हद तो मुक़र्रर कर दो

इन गरीबों के जले घर नहीं देखे जाते

बातों ही बातों में शमशीर निकल जाती है

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post आँखों के सावन में ......
"आदरणीय    लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का…"
11 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post आँखों के सावन में ......
"आदरणीय    अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से…"
11 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post आँखों के सावन में ......
"आदरणीय   Samar kabeerजी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर…"
12 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post आँखों के सावन में ......
"आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का…"
13 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post बारिश पर चंद दोहे :
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ' oजी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का…"
14 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post बारिश पर चंद दोहे :
"आदरणीय  अमीरुद्दीन 'अमीर' oजी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।…"
15 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post बारिश पर चंद दोहे :
"आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का…"
15 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post बारिश पर चंद दोहे :
"आदरणीय Samar kabeer'जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर…"
16 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post ख़्वाबों के रेशमी धागों से .......
"आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से…"
18 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post आज पर कुछ दोहे :
"आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से…"
18 minutes ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post आज पर कुछ दोहे :
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिजी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय…"
19 minutes ago
Sushil Sarna posted a blog post

३ क्षणिकाएँ : याद

३ क्षणिकाएँ : यादआँच सन्नाटे की तड़पा गई यादों का शहर.......................एक टुकड़ा चमकता रहा ख़्वाब…See More
1 hour ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service