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दिन की गर्मी के बाद रात आती है शीतल,

जैसे आता हरित देश बीते जब मरुथल।

समय चक्र ही दुःख की घड़ी बिता सुख लाता,

मृत्यु न होती तो क्या प्राणी जीवन पाता?

सूर्य ज्वलित ना होता तो क्या वसुधा होती?

चन्द्रकिरण से क्या अमृत की वर्षा होती?

लक्ष्य कठिन, दुर्गम्य राह, निश्चय से बनता है सरल।

सूखी रेत, कठोर प्रस्तरों के नीचे ही होता है जल।।

- किशोर करीब (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 14, 2017 at 7:13pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब, समर कबीर साहब और नरेन्द्रसिंह चौहान साहब, सादर नमस्कार।

प्रोत्साहन के लिए आप तीनों गुणी जनों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। आगे भी मार्गदर्शन एवं स्नेह का आकांक्षी हूँ।

Comment by narendrasinh chauhan on August 14, 2017 at 1:21pm

खूब सुन्दर रचना 

Comment by Samar kabeer on August 13, 2017 at 6:19pm
जनाब श्याम किशोर साहिब आदाब,अच्छी लगी कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on August 13, 2017 at 6:18pm
आदरणीय श्याम किशोर जी आदाब,प्रकृति के विभिन्न उपादानों के माध्यम से अच्छा चित्र उकेरने का यत्न किया । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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