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ग़ज़ल - चाँद छिपता रहा फासले के लिए

212 212 212 212

इक नज़र क्या उठी देखने के लिए ।
चाँद छिपता गया फासले के लिए ।।

कोई सरसर उड़ा ले गई झोपड़ी ।
सोचिये मत मुझे लूटने के लिए ।।

मौत मुमकिन मेरी उसको आना ही है ।
दिन बचे ही कहाँ काटने के लिए ।।

जहर जो था मिला आपसे प्यार में ।
लोग कहते गए घूँटने के लिए ।।

रात आई गई फिर शहर हो गई ।
याद कहती रही जागने के लिए ।।

जब रकीबो से चर्चा हुई आपकी ।
फिर पता मिल गया ढूढने के लिए ।।

सज के आए हैं महफ़िल में मेरे सनम ।
इक नज़र भर मेरी फेरने के लिए ।।

कहकशां से भी आवाज़ आई बहुत ।
चाँद क्यों छल रहा जीतने के लिए ।।

यह बताकर जरा तोड़िये दिल मेरा ।
जिस्म था क्या मेरा खेलने के लिए ।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by ajay sharma on August 28, 2017 at 11:48pm

बहुत खूब...

Comment by Samar kabeer on August 23, 2017 at 6:30pm
निगलने के लिये शब्द है 'गुटकने'देखियेगा ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2017 at 5:25pm
आ0 कबीर सर सादर नमन । घूटने शब्द का अर्थ निगलने से है । शेष सुधार भी कर रहा हूँ ।
Comment by Samar kabeer on August 23, 2017 at 3:00pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
मतले का सानी मिसरा भर्ती का है,रदीफ़ से इंसाफ़ नहीं हो रहा है,'फासले'क़ाफ़िया काम नहीं कर रहा,चाँद तो फासले पर ही होता है भाई ।
चौथे शैर में 'घूँटने'का अर्थ क्या है ?
पांचवें शैर के ऊला में 'शहर' को "सहर" कर लें ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2017 at 2:34pm
बहुत खूब...हार्दिक बधाई।
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2017 at 10:43am
आरिफ़ साहब आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2017 at 10:42am
मोहित मिश्र जी आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2017 at 10:42am
अच्छा ध्यान दिलाया आ0 रवि शुक्ल जी और भी शेर में तकबुल ए रदीफ़ है ।
Comment by Ravi Shukla on August 23, 2017 at 10:19am

आदरणीय नवीन मणि जी अच्‍छी गजल कही आपने शेर दर शेर मुबारक बाद पेश है अखिरी शेर के तकाबुले रदीफ को टाला जा सकता है । सादर

Comment by Mohit mishra (mukt) on August 23, 2017 at 9:50am

बढ़िया गज़ल , शेर दर शेर दाद फरमायें 

कृपया ध्यान दे...

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