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“भाभी, उस तरफ़ मत देखो; इस तरफ़ देखो! यह देखो कितना सुन्दर बच्चा! बिल्कुल वैसा ही, जैसा बैडरूम में भैया के लगाये पोस्टर में है, है न!”

“हां, बहू अच्छे चेहरे देखती रहो, अच्छी फिल्में देखो, भगवान ने चाहा तो तू भी मुझे ज़ल्दी ही सुंदर सा पोता देगी!”

सरकारी अस्पताल के महिला वार्ड के आख़री बैड पर अपनी मां के सिरहाने बैठी सम्मो अगले पलंग के पास बैठे किसी परिवार के सदस्यों की बातें सुन कर अपनी मां को और दूध पीती अपनी नन्हीं बहन को बड़ी दया से देखने लगी। मां का उतरा हुआ पीला सा चेहरा और कुछ ही दिन की मरियल सी बहन का कुछ अजीब सा चेहरा देखकर उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े।

“सुंदर बेटे की चाह में मां ने भी शायद सुंदर चेहरे ही देखे होंगे!” यह सोचते हुए उसे याद आ गये घर वालों के चेहरे और उनके बोल।

“देख, इस बार सुंदर सलोनो बेटा ही पैदा करियो!”

“बेटी हुई, तो भगा दूंगा!”

“नौकरी करती है, हम पर कोई अहसान नहीं!”

“कित्ता खायेगी? घर के काम कौन करेगा?”

बारी-बारी से घर की कलह और सबके ताने उसके कानों में फिर से गूंज से रहे थे। हर ताने के साथ घर वालों के चेहरे के भाव भी उसे फिर से झकझोर रहे थे। नौकरी करते हुए, घर-गृहस्थी संभालते हुए उसकी देखभाल करने वाली उसकी मां अपनी खुद की देखभाल में कितनी लापरवाही कर दिया करती थी। वह भी अपनी कोई परेशानी मां को कभी नहीं बताती थी उसकी तरह अपने चेहरे पर भी नकली चेहरे से लगाये हुए।

“तुम अकेली हो यहां! आज घर का कोई बड़ा क्यों नहीं आया अभी तक?” नर्स की आवाज़ सुन कर सम्मो की तंद्रा टूटी। उसने मां को इशारे से बताया। नर्स उससे मुख़ातिब होकर बोली, “बच्ची बहुत कमज़ोर पैदा हुई है! जच्चा-बच्चा दोनों का लम्बा इलाज़ चलेगा।”

“वो तो करा ही लूंगी किसी तरह! लेकिन सिस्टर, घर वालों की सोच का कोई इलाज़ नहीं हो सकता क्या?” पथराई सी आंखें फ़ाड़ कर सम्मो की मां ने नर्स से कहा। नर्स और सम्मो की नज़रें उसकी शक्ल पर टिक गईं।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on Saturday
इस लघुकथा पर समय दे कर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब विजय निकोरे साहिब।
Comment by vijay nikore on November 14, 2017 at 6:59pm

अच्छी लघु कथा के लिए बधाई।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 13, 2017 at 12:21am
रचना पर समय दे कर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब और जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' साहिब।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 12, 2017 at 10:58pm
बहुत उम्दा और सामाजिक बुराई को उकेरती हुई कथा...हार्दिक बधाई
Comment by Samar kabeer on November 12, 2017 at 5:41pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,उम्दा लघुकथा हुई,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2017 at 12:10pm
अनुमोदन वह सकारात्मक टिप्पणी के साथ विचार साझा करने और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब।
Comment by Mohammed Arif on November 12, 2017 at 7:35am
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, बेहतरीन कथानक, कथानक में स्वभाविकता का भरपूर पुट । संवाद भी पात्रानुकूल । हमारे देश में सबको पुत्र कामना रहती है । लगता हैं हम हिंन्दुस्तानी पुत्र की कामना की लाइलाज बीमारी से ग्रसित हैं । इस कामना के चलते बहू पर क्या गुज़रती है हम नहीं सोचते । ढेरों मुबारकबाद !
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 11, 2017 at 10:05pm
मेरी इस रचना के अवलोकन, अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. विजय शंकर साहिब और जनाब तेजवीर सिंह साहिब।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 11, 2017 at 10:03pm
लघुकथा लेखन का मेरा यह प्रयास आपको पसंद आया। कोशिश सफल हुई। तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब सलीम रज़ा रीवा साहिब वह मोहतरमा राहिला साहिबा।
Comment by Rahila on November 11, 2017 at 8:27pm
बहुत बढ़िया रचना हुई आदरणीय उस्मानी जी!ढेरों बधाई ।सादर

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