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*1222 1221

न बदले गर ये' हालात।
फिर आ जायेगी बरसात।।

भले ही कुछ दिनों बाद
मगर होगी करामात।।

तुम आशिक हो ही' बदनाम
दिखा दी अपनी' औकात।।

मुझे कोई न इतराज़
कभी कर लो मुलाकात।।

करूँ कैसे अब इतिबार,
तुम आये हो अकस्मात।।

किसी से कुछ न अब उम्मीद,
सुनो मेरे खयालात​।।

फ़ना तुझपे दिलो जान
करूँ तो फिर बने बात।।

ज़वानी जोश में आज
न कर बैठे कुछ उत्पात।।

नहीं है 'दीप' मंजूर
करे कोई खुराफ़ात।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on Wednesday
ज़नाब समर कबीर साहिब!
आद० सुरेन्द्र नाथ सिंह जी!

ग़ज़ल में आपकी शिरकत-ओ-हौसला आफ़ज़ाई के लिए मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार हूँ।
गुज़ारिश है कि इस ग़ज़ल में हुई ख़ामियों पर निशानदेही फ़रमाने की मेहरबानी अता करें।
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on Wednesday
आद0 प्रदीप पांडेय जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल पर आपके प्रयास की प्रंशसा करता हूँ। ग़ज़ल में शैर भले बिम्ब के सहारे कहे जाएं पर बात निकल कर आनी तो चाहिए, पर आपके शैर में अभी उस तरह के कथ्य का अभाव दिखा, आपके प्रयास की भूरि भूरि तारीफ और शुभकामनाएं। सादर
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on Wednesday
आद0 प्रदीप पांडेय जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल पर आपके प्रयास की प्रंशसा करता हूँ। ग़ज़ल में शैर भले बिम्ब के सहारे कहे जाएं पर बात निकल कर आनी तो चाहिए, पर आपके शैर में अभी उस तरह के कथ्य का अभाव दिखा, आपके प्रयास की भूरि भूरि तारीफ और शुभकामनाएं। सादर
Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 3:18pm
जनाब प्रदीप कुमार पाण्डेय'दीप'जी आदाब,ग़ज़ल अभी बहुत समय चाहती है,मंच पर ग़ज़ल की कक्षा का लाभ उठायें,इस प्रयास पर बधाई ।

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