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उसकी सूरत नई नई देखो

2122 1212 22
उसकी सूरत नई नई देखो ।
तिश्नगी फिर जगा गई देखो।।

उड़ रही हैं सियाह जुल्फें अब ।
कोई ताज़ा हवा चली देखो ।।

बिजलियाँ वो गिरा के मानेंगे ।
आज नज़रें झुकी झुकी देखो ।।

खींच लाई है आपको दर तक ।
आपकी आज बेखुदी देखो ।।

रात गुजरी है आपकी कैसी ।
सिलवटों से बयां हुई देखो ।।

डूब जाएं न वो समंदर में ।
क्या कहीं फिर लहर उठी देखो ।।

हट गया जब नकाब चेहरे से ।
पूरी बस्ती यहां जली देखो ।।

वो तसव्वुर में लिख रहा ग़ज़लें ।
याद आती है आशिकी देखो ।।

खत को पढ़कर जला दिया उसने ।
चोट दिल पर कहीं लगी देखो ।।

उसके दिल में धुंआ अभी तक है ।
आग अब तक नहीं बुझी देखो ।।

नवीन मणि त्रिपाठी

         नवीन मणि त्रिपाठी 

मौलिक अ प्रकाशित

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Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on December 17, 2017 at 12:27pm

आ0 रक्षिता सिंह जी सादर आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 17, 2017 at 12:26pm

सादर नमन के साथ आभार भाई सुरेंद्र नाथ सिंह जी 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on December 11, 2017 at 4:53am

आद0 नवीन जी सादर अभिवादन। आद0 आली जनाब समर कबीर साहब के इस्लाह से ग़ज़ल में चार चाँद तो लगी है, मिसरों बीच रब्त और गजलियत दोनों निखर रही है,  बहुत बहुत बधाई आपको, और आद0 समर सर् को सादर प्रणाम।

Comment by Rakshita Singh on December 8, 2017 at 1:42am

आदरणीय , नवीन जी

बहुत ही खूबसूरत गज़ल , बहुत बहुत बधाई।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 8, 2017 at 12:13am

नमन सर 

Comment by Samar kabeer on December 7, 2017 at 9:13pm

बहुत ख़ूब ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 7, 2017 at 6:18pm

जनाब अफरोज सहर साहब शुक्रिया के साथ अमीन

Comment by Afroz 'sahr' on December 7, 2017 at 4:26pm
जनाब नवीन मणि जी इस सुंदर रचना पर बहुत बधाई आपको,,,,
Comment by Samar kabeer on December 7, 2017 at 1:46pm

आमीन, सुम्मा आमीन ।

Comment by Afroz 'sahr' on December 7, 2017 at 12:03pm
आमीन,,,

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