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ग़ज़ल..रात भर-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुतदारिक सालिम मुसम्मन बहर
212 212 212 212
आँख आँसू बहाती रही रात भर

दर्द का गीत गाती रही रात भर

आसमां के तले भाव जलते रहे
बेबसी खिलखिलाती रही रात भर

बाम पे चाँदनी थरथराने लगी
हर ख़ुशी चोट खाती रही रात भर

रूह के ज़ख्म भी आह भरने लगे
आरजू छटपटाती रही रात भर

प्यार की राह में लड़खड़ाये कदम
आशकी कसमसाती रही रात भर

आह भरते हुये राह तकते रहे
राह भी मुँह चिढ़ाती रही रात भर
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 5:35pm

खूबसूरत सुझाव है आदरणीय लेकिन मैं सोच रहा हूँ एक शेर का लालच कम कर दिया जाये और मतले से उला और छठे शेर से सानी लेकर मतला कर दिया जाये..अर्थात "आँख आँसू बहाती रही रात भर,दर्द का गीत गाती रही भर" क्या उचित रहेगा?सादर

Comment by Samar kabeer on January 9, 2018 at 11:01am

'नाव इक साहिलों से बिछड़ते हुए'

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 12:37am

आदरणीय लक्षमण धामी जी सादर प्रणाम..

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 12:34am

आदरणीय समर सर आपकी टिप्पड़ी को ध्यान से न पढूं ये संभव नहीं है..बस जबाब में उल्लेख नहीं कर सका..कश्तियां बहुवचन हो रहा है जिससे काफ़िया मिल नहीं रहा है..आदरणीय शुक्रिया..प्रयास करता हूँ कुछ अच्छा बदलाव कर सकूँ..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 12:31am

जी आदरणीय सुरेन्द्र जी कोशिश करता हूँ..आदरणीय सलीम जी ने एक खूबसूरत सुझाव दिया मैं भी कुछ प्रयास कर ही लेता हूँ..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 12:29am

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय कालीपद मंडल जी..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 12:28am

बहुत ही खूबसूरत ख्याल है आदरणीय सलीम जी..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 12:27am

आदरणीय रामअवध जी सादर प्रणाम..अपने बिलकुल सत्य कहा शायद कभी न कभी कानों में पड़ा और फिर बिसार दिया हो..बिलकुल संभव है।मैं कुछ बदलाव की कोशिश करता हूँ..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2018 at 10:52pm

हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on January 8, 2018 at 2:35pm

मतले ऊला मिसरा बदल दीजिये ।

मेरी टिप्पणी आपने ध्यान से नहीं पढ़ी,मतले के अलावा भी कुछ लिखा है?

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