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-धन्यवाद, पैसे खाते में आ गये।प्रयाग में विमोचन हो जाये?
-‎अच्छा रहेगा।
-‎हॉल वगैरह बुक कर दिया है।बस कुछ लोगों की व्यवस्था आप करा लीजिये।
-‎आपके प्रकाशन की और पुस्तकें भी हैं न?
-‎थीं,पर अब उनका विमोचन शायद अलग से हो।
-‎क्यूँ?
-‎लेखकों की भागीदारी पूरी नहीं हो रही है।
-‎फिर?
-‎यह कार्यक्रम आपका ही होगा।सम्मानित भी हो जायेंगे आप।
-‎बात तो समूह में पुस्तकों के विमोचन की थी।
-‎सम्भव नहीं है।
-‎फिर अलग से देखेंगे।मेरे पैसे में कितनी प्रतियाँ छपेंगी?
-‎दो सौ।
-‎छाप दीजिये',लेखक-कवि की वाणी सुदृढ़ थी।
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by vijay nikore on January 18, 2018 at 8:34am

सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकार करें।

Comment by विनय कुमार on January 17, 2018 at 2:48pm

साहित्य की वर्तमान हालात को बयां करती बढ़िया रचना, बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Nita Kasar on January 16, 2018 at 3:41pm

सम्मान खुद करवाने की ललक का कोई ओर छोर नही उम्दा कथा है बधाई  आद० मनन कुमार सिंह जी ।

Comment by Manan Kumar singh on January 15, 2018 at 10:03pm

आपका आभार आदरणीया कल्पना जी।

Comment by Manan Kumar singh on January 15, 2018 at 10:03pm

आदरणीय समर जी,नमन।आपका आभार ।

Comment by Manan Kumar singh on January 15, 2018 at 10:01pm

आपका आभार आदरणीय महेंद्र जी।

Comment by Manan Kumar singh on January 15, 2018 at 10:01pm

आपका आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 15, 2018 at 9:26pm

वाह! आज के साहित्य जगत मैं ऐसा ही हो रहा है| हार्दिक बधाई इस लघुकथा के लिए|

Comment by Samar kabeer on January 15, 2018 at 3:17pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, बढ़िया प्रस्तुति ,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mahendra Kumar on January 15, 2018 at 10:16am

वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य पर अच्छी लघुकथा कही है आपने आ. मनन जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

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