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विरह अग्नि में दह-दह कर के

गीत 

मात्र भार १६ १६ 

बहला रहा रोज इस दिल को,  

किस्से बचपन के कह कर के.

तेरी महकी महकी यादें,

मैंने रख लीं हैं तह कर के.

 

प्रथम दृष्टि का वह सम्मोहन,

भूल नहीं अब तक मैं पाया.

और कर्ण प्रिय तव गीतों ने,

रात और दिन तरसाया .

 

ढूँढ रहे हैं तेरी खुशबू,

भ्रमर बाग़ में रह-रह कर के.

 

शुभ्र चाँदनी आकर अँगना,

खोज रही तेरा मुखमंडल.

थोड़ा ठहर, जरा सुस्ता ले,

ऊर्जा से फिर भर ले आँचल.

 

सो जाए कुछ देर गोद में,

वह हाथ-हाथ में गह कर के

 

सूना सूना घर आँगन है,

रंग उड़े दीवारों के.

बालकनी की कुर्सी पूछे,

किस्से रोज बहारों के

 

मेरा प्रेम स्वर्ण सा निखरा,  

विरह अग्नि में दह-दह कर के

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on January 20, 2018 at 6:23pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आपकी हौसलाफजाई का शुक्रिया दिल से 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 20, 2018 at 3:16pm

आदरणीय शर्मा जी बहुत ही खूबसूरत गीत हुआ..सादर

कृपया ध्यान दे...

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