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मेरा हमदम है तो हर ग़म से बचाने आए - सलीम रज़ा रीवा

2122 1122 1122 22
मेरा हमदम है तो हर ग़म से बचाने आए
मुश्किलों में भी मेरा साथ निभाने आए 
-
जिनको जीने की दुआ मैंने हमेशा दी है  
आज महफ़िल में वही ऊँगली उठाने आए
-
काम तलवारों से तीरों से सदा है जिनको
अम्न की बात वही मुझको सिखाने आए
-
पाप धुल जाते हैं सुनते हैं यहां पर आ कर
लोग यूँ ही तो नहीं गंगा नहाने आए 
-
दिल न तोड़ेंगे कभी इतना यक़ीं था जिनपर
बे वफाई का वो इल्ज़ाम लगाने आए
-
जिनके दिल में है महब्बत ऐ रज़ा तेरे लिए
तेरी बर्बादी पे वो अश्क़ बहाने आए
_______________________________
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Sunday

सुंदर गजल हुई है आदरणीय हार्दिक बधाई ।

Comment by नादिर ख़ान on Sunday

पाप धुल जाते हैं सुनते हैं यहां पर आ कर
लोग यूँ ही तो नहीं गंगा नहाने आए ...अच्छी गज़ल हुयी है मुबारकबाद जनाब  सलीम रज़ा साहब ...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Sunday

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही आदरणीय...

Comment by Rakshita Singh on Sunday

आदरणीय सलीम जी

बहुत ही बेहतरीन गजल,

हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by Anita Maurya on Saturday

वाह, खूबसूरत ग़ज़ल....

Comment by SALIM RAZA REWA on Friday
राम अवध जी बहुत शुक्रिया
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on Thursday

जनाब सलीम रज़ा साहिब, उम्दा ग़ज़ल हो गई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें। आखरी शेर में अभी भी ऐब-तकाबुले रदीफैंन है । उला मिसरा यूँ कर लें । जिनके दिल में भी रज़ा तेरे लिए है उल्फ़त 

Comment by Mohammed Arif on February 15, 2018 at 7:49am


जिनको जीने की दुआ दी है हमेशा मैंने
आज महफ़िल में वही ऊँगली उठाने आए वाह! वाह!! क्या ख़ूब तंज़ कसा है ।  बहुत ही उम्दा शे'र ।

दिली मुबारकबाद आदरणीय सलीम रज़ा साहब ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on February 14, 2018 at 10:25pm

आदर्णीय  सलीम रज़ा साहब खूबसूरत ग़ज़ल कहने के लिये बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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