For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

2122-1122-1122-22

टूटकर ख्वाब ज़माने में बिखर जाते हैं ।
आज़माने में बहुत लोग मुकर जाते है ।।

वो जलाता ही रहा हमको बड़ी शिद्दत से ।
हम तो सोने की तरह और निखर जाते हैं ।।

हुस्न वालों के गुनाहों पे न पर्दा डालो ।
क्यूँ भले लोग यहां इश्क से डर जाते हैं ।।

मुन्तजिर दिल है यहां एक शिकायत लेकर ।
आप चुप चाप गली से जो गुज़र जाते हैं ।।

कुछ उड़ानों की तमन्ना को लिए था जिन्दा ।
क्या हुआ आपको जो पर को कतर जाते हैं ।।

मत बयां कीजिये अपने भी सितम के किस्से ।
दर्द बनकर वो यहां दिल में ठहर जाते हैं ।।

इस मुहब्बत पे है इल्जाम का साया मुमकिन ।
वो सरे आम निगाहों से उतर जाते हैं ।।

उसके आने की खबर जब भी हुई महफ़िल को ।
आहटे हुस्न से कुछ लोग सवंर जाते हैं ।।

क्यूँ छुपाते हैं मियाँ आप मुहब्बत अपनी ।
सबको मालूम है अब आप किधर जाते हैं ।।

---नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

Views: 169

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 24, 2018 at 7:42pm
आ0 नीलेश जी सप्रेम आभार । आपकी इस्लाह महत्वपूर्ण है । भर्ती के शब्दों से बचने का प्रयास अवश्य करूँगा ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2018 at 8:24pm

आ. नवीन जी 
ग़ज़ल विषय पर आप की ग़ज़लें मंच पर लगातार आती हैं और उत्तरोत्तर कहन भी बेहतर होता जा रहा है.
आप को अब अन्य बारीकियाँ जैसे भर्ती के शब्द  (जैसे 
क्या हुआ आपको जो पर को कतर जाते हैं ..पर कतर जाते हैं पर्याप्त होता  लेकिन बहर के लिए   को   डालना पडा) आदि पर और अधिक तन्कीदी निगाह से ध्यान देना चाहिए .
साथ ही एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है  कि जो शेर हो प्रासंगिक हो, संख्या से उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना कंटेंट से पड़ता है.
आप चूँकि अच्छा लिख रहे हैं इसलिए  यह सारी बातें बताना कर्तव्य समझा ..
कृपया अन्यथा न लें 
सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 18, 2018 at 8:19pm

वाह वाह आदरणीय त्रिपाठी खूब ग़ज़ल कही...

Comment by Harash Mahajan on April 18, 2018 at 5:38pm

सूंदर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई आदरणीय नवीन जी ।

सादर ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 18, 2018 at 4:21pm

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on April 17, 2018 at 9:15pm

कुछ उड़ानों की तमन्ना को लिये था जिन्दा

बहुत खूबसूरत शेर है बहु बहुत बधाई

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 17, 2018 at 7:35pm

आ0 बसंत कुमार शर्मा साहब सादर आभार ।

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 3:19pm

कृपया पटल पर आई रचनाओं पर अपनी टिप्पणी दिया करें ।

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 3:13pm

जनाब नवीन जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

दूसरे शैर के ऊला में 'बड़ी शिद्दत से' को "बहुत शिद्दत से" कर लें ।

'क्यों भले लोग यहाँ इश्क़ से डर जाते हैं'

इस मिसरे को यूँ कर लें :-

'क्योंकि कुछ लोग यहाँ इश्क़ से डर जाते हैं'

छटे शैर के ऊला में 'अपने भी' को "अपने ही" कर लें ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 17, 2018 at 9:49am

वाह क्या कहने , बहुत सुंदर मनभावन गजल 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"मुहतरम वासुदेव साहिब  , ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया…"
4 minutes ago
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"सम्मान.....उच्च कुल के होने का,न लेना नाम।इसके आधार पर ये समाज,नहीं देगा मान।यदि अपार होगा धन…"
4 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"आ. अनीता जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
1 hour ago
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८१
"जी जनाब, मैं समझ गया, बहुत बहुत शुक्रिया. मिसरे को बदलता हूँ. मगर, लुगत में दिए उन तीन शब्दों को…"
2 hours ago
नादिर ख़ान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"जनाब मोहम्मद आरिफ साहब उम्दा रचनाकर्म के लिए  मुबारकबाद ....... "
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"आ. भाई नादिर खान जी, प्रदत्त विषय पर सुंदर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"आ. भाई आरिफ जी, प्रदत्त विषय पर सानदार कटाक्क्षिकाये हुयी हैं । हार्दिक बधाई ।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"आ. भाई तस्दीक अहमद जी, प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।"
2 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"जनाब डॉक्टर छोटे लाल साहिब , ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया…"
2 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"मुहतरम जनाब आरिफ साहिब आ दाब , प्रदत्त विषय पर हक़ीक़त बयान करती सुंदर कटाक्षिकाएँ हुई हैं,…"
2 hours ago
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"वाह तस्दीक़ साहिब लाज़बाब ग़ज़ल की हृदय से बधाई स्वीकार करें। हर शेर में गहरा तंज।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-98
"सम्मान ( दोहे ) पाती नित घर गाँव में, जहाँ नार सम्मानकरें वहीं पर वास आ, संत कहें भगवान।१। सदा…"
3 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service