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भला कैसे(अतुकांत):- मोहित मुक्त

दूर क्षितिज में-
तुम्हारे अधर की ज्यों रंगत चुराकर -
प्राची के प्रान्त पर रक्तिम सी आभा,
हो बिखरने को आकुल तभी मीत मेरे,
मुझे चूमकर तुम जगाने लगो ,
कहो कैसे गाऊँ शुभाषित सुबह के !
प्रणय-छंद ना फिर उच्चारा करूं।


शशि मुख पर-
छिटक आये केश-वेणी से खुल-
प्यारे लट को झटककर झुंझलाती तुम,
हस्त-व्यस्त हों कहीं, होके लाचार सी ,
तुम पुकारो मुझे जब बड़े प्यार से ,
मैं भला कैसे उन्माद से छूट कर ,
रुक जाऊं! तुम्हे ना सताया करूं।

ऐ मेरी-
वर्षा की प्रथम फुहारों से उपजी -
हरे दूब की चादर सी मुलायम परी ,
जब तुम स्निग्ध मुस्कान अधर पर लिए,
मासूम बच्चे सी निर्द्वंद सोती रहो ,
मैं भला कैसे तृष्णा से विमुक्त हो-
सो जाऊँ! तुम्हें न निहारा करूँ।


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mishra (mukt) on June 7, 2018 at 9:54pm

आदरणीया नीलम दीदी , रचना को मान देने का अत्यंत शुक्रिया

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 7, 2018 at 9:53pm

आदरणीय महेंद्र जी बहुत बहुत आभार

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 7, 2018 at 9:53pm

आदरणीय आरिफ जी आदाब ,
रचनावलोकन और मार्गदर्शन का तहे दिल से शुक्रिया

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 6, 2018 at 9:10pm

आदरणीय श्याम नारायण जी , रचना को मान देने का अत्यंत शुक्रिया

Comment by Neelam Upadhyaya on June 4, 2018 at 11:50am

सुंदर रचना की प्रस्तुति के बधाई स्वीकार करें अदरणीय मोहित जी ।

Comment by Mahendra Kumar on June 2, 2018 at 6:14pm

बढ़िया भावाभिव्यक्ति है आदरणीय मोहित जी. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by Mohammed Arif on June 2, 2018 at 11:02am

आदरणीय मोहित जी आदाब,

                 प्रेम रस में डूबी बेहतरीन अतुकांत कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सरल-सरस शब्दों के प्रयोग से भी रचना ज़ियादा प्रभावशाली बन सकती है ।

Comment by Shyam Narain Verma on June 2, 2018 at 10:19am
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई सादर

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