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जाहिल हैं कुछ लोग, तुम्हें काफ़िर लिखते हैं।

जाहिल हैं कुछ लोग,

तुम्हें काफ़िर लिखते हैं।
अहले दीन की सुनो, तुम्हें ज़ाकिर लिखते हैं॥

 

वो जो इल्म के जानिब,

शमशीर ले कर निकला।
बाक़ी हैं कुछ लोग, उसे माहिर लिखते हैं॥

 

तड़पती प्यास लेकर आए

थे तुम जो सहरा से।
प्यार से हम तुम्हें, तहज़ीबे साहिर लिखते हैं

 

रहो तो इस तरह, फिजाँ में

महक सी बनकर।
कि हवाओं में जैसे चन्दन, शाइर लिखते हैं॥

 

अदबो-अदीब औ

तहज़ीब भी मानो इसको।
पनाह दे जो माटी उसको, ताहिर लिखते हैं॥

 

मौलिक तथा अप्रकाशित....

सुधेन्दु ओझा

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