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गजल २१२२ २१२२ 
बात जो मन में तही है
कुछ कही कुछ अनकही है
भार ढोती है जगत का
तब धरा यह पुज रही है
याद वो, आये न आये
पर सताती रोज ही है
है कठिन यह जान पाना
क्या गलत है क्या सही है
इस कदर छाया है दिल पर
हर जगह दिखता वही है
सच कहो अब चुप न बैठो
क्यों जमा मुँह में दही है
राम के दरबार में सब
आपकी खाता बही है
"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा yesterday

आदरणीय विजय निकोरे जी दिल से शुक्रिया आपका , सह कहा आपने इस मंच पर आदरणीय समर कबीर जी का नेह बरसता ही है 

Comment by बसंत कुमार शर्मा yesterday

आदरणीय अजय तिवारी जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा yesterday

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा yesterday

आदरणीया नीलम उपाध्याय जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by Samar kabeer on Saturday

भाई विजय निकोर जी,आपकी महब्बत सर आँखों पर ।

Comment by vijay nikore on Saturday

भाई समर जी, आप हमेशा इतनी अच्छी सहीह जानकारी देते हैँ कि पढ़ते ही और जानने को मन करता है। ...और मन यह भी करता है कि आपको बस सुनता रहूँ।

Comment by vijay nikore on Saturday

अच्छी गज़ल के लिए बधाई

Comment by Ajay Tiwari on Saturday

आदरणीय बसंत जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई. 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday

ग़ज़ल बहुत ही खूबसूरत कही है आदरणीय..और आदरणीय समर जी ने एक ज्ञान बात भी बताई..बहुत बहुत शुक्रिया..

Comment by Neelam Upadhyaya on Friday

बढ़िया  ग़ज़ल की पेशकश के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी। 

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