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मुश्किलों में मुस्कुराना सीख लो।

ज़िंदगी से दिल लगाना सीख लो ॥

शौक़ पीने का तुम्हें माना मगर।  

दूसरों को भी पिलाना सीख लो॥

ढूँढने हैं मायने गर जीस्त के।

तो राग तुम कोई पुराना सीख लो॥

सत्य की है ख़ोज तुमको अगर।

ख़ुद से पहले हार जाना सीख लो ॥

बस में दुनियाँ तेरे भी हो जाएगी।    

ख़ुद पे पहले पार पाना सीख लो॥ 

दूसरों की पीड़ पे ना खिलखिला।  

अश्कों से दामन भिगाना सीख लो॥

झाँकते फ़िरते हो क्यूँ दूजों के घर।

अपने घर भी आना जाना सीख लो॥

तू है गर सच्चा तो नज़रें मत घूमा।

आंखो से आंखे मिलाना सीख लो॥

स्वांग धरते हर बार तुम क्यूँ एक सा।  

दूसरा कोई बहाना सीख लो॥

बारहा टूटा मगर ज़िंदा है ‘दीप’ ।

ऐसा होता है दीवाना सीख लो॥

 

-प्रदीप भट्ट –

 

मौलिक व अप्रकाशित  

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 1:57am

आ. प्रदीप जी, अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई । 

तीसरा शेर बेबहर लग रहा है और इस शेर का भाव स्पष्ट नहीं हो पाया है देख लें

झाँकते फ़िरते हो क्यूँ दूजों के घर।

अपने घर भी आना जाना सीख लो॥

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 23, 2018 at 4:58pm

अच्छी ग़ज़ल कही ज़नाब प्रदीप जी..बधाई

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