For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

2122 1122 1122 22

शायरी फख्र से महफ़िल में जुबानी आई ।
आप आये तो ग़ज़ल में भी रवानी आई ।।

लौट आयीं हैं तुझे छू के हमारी नजरें ।
जब दरीचे पे तेरे धूप सुहानी आई ।।

पूँछ लेता है वो हर दर्द पुराना मुझसे ।
अब तलक मुझको कहाँ बात छुपानी आई ।।

तीर नजरों से चला कर के यहां छुप जाना ।
नींद मेरी भी तुझे खूब चुरानी आई ।।

मुद्दतों बाद जो गुजरा था गली से इकदिन ।
याद मुझको तेरी हर एक निशानी आई ।।

दर्द पूछा जो किसी ने तो जुबां पर उसकी ।
बारहा ज़ुल्म की तेरी वो कहानी आई ।।

क्यों करूँ शिकवा गिला तुमसे भला ऐ साकी ।
मेरे हिस्से में जो बोतल थी पुरानी आई ।।

रहजनों की है नज़र अब तो सँभल कर निकलो ।
बज़्म से लुट के कई बार सयानी आई ।।

हो गए खूब फ़ना ज़ुल्फ़ पर लाखों आशिक ।
जब भी चेहरों पे कहीं सुर्ख जवानी आई ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Views: 99

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 26, 2018 at 1:26pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब हार्दिक आभार। 

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 26, 2018 at 1:26pm

आ0 धामी साहब सादर आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 25, 2018 at 11:39am

आ0 कबीर सर सादर नमन के साथ शत शत आभार आपकी इस्लाह अत्यंत महत्वपूर्ण है । वाकई आपकी इस्लाह मेरी ग़ज़ल में चार चांद लगा देती है । 

जब आप मेरी ग़ज़ल तक आते हैं तो धन्य हो जाता हूँ ।

सादर नमन ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 2:11am

आ. भाई नवीन जी , अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई । शेष गुणी जन विचार रख ही चुके हैं ।

Comment by Samar kabeer on October 24, 2018 at 3:51pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

शायरी फख्र से महफ़िल में जुबानी आई ।
आप आये तो ग़ज़ल में भी रवानी आई ।।--मतले का ऊला स्पष्ट नहीं,शिल्प कमज़ोर है, यूँ करें:-

'शाइरी फ़ख़्र से महफ़िल में सुनानी आई'

लौट आयीं हैं तुझे छू के हमारी नजरें ।
जब दरीचे पे तेरे धूप सुहानी आई ।।--ठीक है ।

पूँछ लेता है वो हर दर्द पुराना मुझसे ।
अब तलक मुझको कहाँ बात छुपानी आई ।।--ऊला में 'पूंछ' को "पूछ" कर लें,पचास बार आपको बता चुका हूँ ।

तीर नजरों से चला कर के यहां छुप जाना ।
नींद मेरी भी तुझे खूब चुरानी आई ।।--ठीक है ।

मुद्दतों बाद जो गुजरा था गली से इकदिन ।
याद मुझको तेरी हर एक निशानी आई ।।--ठीक है ।

दर्द पूछा जो किसी ने तो जुबां पर उसकी ।
बारहा ज़ुल्म की तेरी वो कहानी आई ।।--ठीक है ।

क्यों करूँ शिकवा गिला तुमसे भला ऐ साकी ।
मेरे हिस्से में जो बोतल थी पुरानी आई ।।--सुना है,पुरानी शराब ज़ियादा मज़ा देती है,फिर शिकवा कैसा?

रहजनों की है नज़र अब तो सँभल कर निकलो ।
बज़्म से लुट के कई बार सयानी आई ।।--सानी में 'कई' की जगह "हर" कर लें ।

हो गए खूब फ़ना ज़ुल्फ़ पर लाखों आशिक ।
जब भी चेहरों पे कहीं सुर्ख जवानी आई--ठीक है ।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 23, 2018 at 6:04pm

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल।

अब न चर्चा करो तुम मेरी मुहब्बत की हुजूऱ ।
अब तलक मुझको कहाँ बात छुपानी आई ।।

क्यों करूँ शिकवा गिला तुमसे भला ऐ साकी ।
मेरे हिस्से में जो बोतल थी पुरानी आई ।।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-105
"आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। आज के मुशायरे का आगाज़ बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल के साथ करने पर आपको बहुत…"
3 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-105
"इल्म से अपने दिमाग़ों में चराग़ाँ कर देंमेरे उस्ताद जिसे चाहें ग़ज़ल ख़्वाँ कर दें डूब कर रंग में…"
4 hours ago
Surkhab Bashar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-105
"मोहतरम जनाब समर कबीर साहब  आदब  बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारक बाद कुबूल…"
5 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-105
"वाह !"
5 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-105
"इससे पहले कि ये सब चाक गरेबाँ कर दें वोट जो पास है अपने उसे क़ुरबां कर दें बच गया जो हो ज़रा आँख में…"
5 hours ago
Surkhab Bashar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-105
"ग़ज़ल आओ इस देश को मिलजुल के गुलिस्ताँ कर दें इसके उजड़े हुए शहरों में चराग़ाँ कर दें हम वतन के…"
6 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-105
"राह दुश्वार बहुत है इसे आसां कर दें ख़ून से अपने बयाबां को गुलिस्ताँ कर दें आज़माने के लिए अज़्म को…"
6 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post 'मुझे भी!' (लघुकथा) :
"आदाब। बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब समर कबीर साहिब।"
8 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"समस्त परिवारजन को रंगोत्सव पर हार्दिक बधाइयां और शुभकामनाएं।"
8 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"जनाब गणेश जी "बाग़ी" साहिब आदाब, बहुत-बहुत  मुबारकबाद ।"
8 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय समर कबीर जी..आपको भी होली की शुभकामनाएं.."
11 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (यूँ ही तो न मायूस हम हो गए)
"जनाब ब्रजेश कुमार साहिब  , ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I "
14 hours ago

© 2019   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service